अतिक्रमण और भ्रष्टाचार के 'जाम' में फंसी जनता, कागजी दावों की खुली पोल
- ख़ानक़ाह पुलीस चोकी क्षेत्र में क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है?
- या फिर भ्रष्टाचार की चादर ओढ़कर जनता के सब्र का इम्तिहान लिया जा रहा है?
देवबंद। विश्व प्रसिद्ध शिक्षण संस्थान दारुल उलूम का क्षेत्र इन दिनों अपनी ऐतिहासिक पहचान के लिए नहीं, बल्कि प्रशासन की नाकामी और बेतहाशा अतिक्रमण के लिए सुर्खियों में है नगरवासी 'अतिक्रमण की अति' से इस कदर त्रस्त हैं कि गलियों में पैदल चलना भी दूभर हो गया है हैरानी की बात यह है कि जहाँ शासन-प्रशासन 15 अलग-अलग अभियानों का ढिंढोरा पीट रहा है, वहीं देवबंद की सड़कों को इस नरक से मुक्ति दिलाने वाला कोई नहीं है।
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बीते साल ही ख़ानक़ाह चोकी के तत्कालीन प्रभारी भारी दलबल के साथ सड़कों पर उतरे थे तब लगा था कि देवबंद को अतिक्रमण से मुक्ति मिलेगी, लेकिन आज जमीनी हकीकत देखकर यह स्पष्ट है कि वह केवल मीडिया में फोटो छपवाने की एक 'पीआर एक्सरसाइज' थी अभियान थमते ही अतिक्रमणकारी फिर से सड़कों पर काबिज हो गए और प्रशासन ने दोबारा उधर मुड़कर देखना मुनासिब नहीं समझा।
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नगर के मुख्य मार्ग और गलियाँ अब जाम का पर्याय बन चुकी हैं विशेष रूप से दारुल उलूम रोड व मस्जिद रशीद रोड कदीम मस्जिद चौक से सरसटा बाजार छत्ता मस्जिद से बडजियाउलहक मार्ग इन रास्तों पर दुकानदारों के फैले सामान और सड़कों पर खड़े ई-रिक्शाओं ने आम आदमी का जीना मुहाल कर दिया है।
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सूत्रों का दावा है कि अतिक्रमणकारियों और स्थानीय प्रशासन के बीच 'मजबूत सेटिंग' का खेल चल रहा है। कथित तौर पर अवैध वसूली के कारण ही अधिकारी इस ओर से आँखें मूँदे हुए हैं देवबंद में आए दिन बड़े अधिकारियों का काफिला गुजरता है लेकिन क्या उन्हें ये ख़ानक़ाह चोकी क्षेत्र की सड़कें नजर नहीं आतीं? या फिर 'नजराने' का पर्दा उनकी आँखों पर भी पड़ा हुआ है? आम आदमी 100 रुपये लीटर पेट्रोल डलवाकर 20-20 मिनट तक जाम में खड़ा रहता है यह न केवल समय की बर्बादी है, बल्कि जनता की गाढ़ी कमाई पर प्रशासनिक लापरवाही का सीधा प्रहार है।
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वर्तमान में सहारनपुर पुलिस द्वारा चलाए जा रहे 15 विशेष अभियानों के बीच देवबंद की जनता ने मांग की है कि 'अतिक्रमण मुक्त देवबंद' को भी प्राथमिकता में शामिल किया जाए जब तक भ्रष्टाचार की जड़ें नहीं काटी जाएंगी और ई-रिक्शाओं के लिए कड़े नियम नहीं बनेंगे, तब तक जनता इस नारकीय जीवन को जीने के लिए मजबूर रहेगी।
रिपोर्ट - दीन रज़ा




