करोड़ों की घोषणाओं के बीच देवबंद की बड़ी उम्मीदें हुईं धराशायी

करोड़ों की घोषणाओं के बीच देवबंद की बड़ी उम्मीदें हुईं धराशायी

  • विकास के दावों के बीच 'फतवा' और 'ध्रुवीकरण' का तड़का
  • युवाओं को खेल का मैदान नहीं, सिर्फ भाषण मिला, ट्रॉमा सेंटर और डिग्री कॉलेज का इंतजार

देवबंद। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का 7 मई 2026 को देवबंद के जड़ौदा जट्ट में हुआ दौरा कागजों पर भले ही करोड़ों की सौगात वाला नजर आए, लेकिन स्थानीय धरातल पर यह 'ऊंट के मुंह में जीरा' जैसा ही साबित हुआ। मुख्यमंत्री ने अकेले देवबंद विधानसभा के लिए ₹523.27 करोड़ की घोषणाएं तो कीं, लेकिन उन बुनियादी सवालों और दशकों पुरानी मांगों पर चुप्पी साध ली, जिनके लिए देवबंद की जनता टकटकी लगाए बैठी थी।

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करोड़ों की विकास परियोजनाओं के लोकार्पण के बीच मुख्यमंत्री अपने पुराने अंदाज में नजर आए। उन्होंने देवबंद की ऐतिहासिक पहचान को 'फतवों' से जोड़ते हुए निशाना साधा और पुरानी यादें ताजा कर हिंदू-मुस्लिम कार्ड खेलने से परहेज नहीं किया। स्थानीय लोगों का मानना है कि चुनाव नजदीक आते ही विकास की बातों के बीच इस तरह के संवेदनशील मुद्दों का जिक्र करना असल समस्याओं से ध्यान भटकाने की एक सोची-समझी रणनीति है।

​देवबंद की भौगोलिक स्थिति और निरंतर बढ़ती आबादी को देखते हुए इसे पृथक जनपद (District) बनाने की मांग दशकों से चली आ रही है। स्थानीय लोगों को प्रबल उम्मीद थी कि मुख्यमंत्री इस बार देवबंद को तहसील से जिला बनाने की दिशा में कोई ठोस कदम उठाएंगे या कम से कम कोई बड़ा संकेत देंगे। लेकिन, मुख्यमंत्री के संबोधन में इस मुद्दे का जिक्र तक न होना क्षेत्रवासियों के लिए सबसे बड़ी निराशा बनकर उभरा।

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​गन्ना बाहुल्य क्षेत्र होने के नाते किसानों को उम्मीद थी कि इस दौरे में बंद पड़ी औद्योगिक इकाइयों को दोबारा शुरू करने या किसी नए बड़े कृषि आधारित उद्योग (Agro-industry) की घोषणा होगी। किसान नेता गन्ना मूल्य वृद्धि और बकाया भुगतान के स्थायी समाधान की उम्मीद लेकर मुख्यमंत्री से मिलना चाहते थे, लेकिन प्रशासन ने लोकतांत्रिक तरीके से आवाज उठाने जा रहे किसान नेताओं को हाउस अरेस्ट (नजरबंद) कर उनकी उम्मीदों पर ताला लगा दिया। गन्ने के इस 'गढ़' में किसानों को मुख्यमंत्री के पिटारे से सिर्फ आश्वासन ही हाथ लगे।

​देवबंद का वर्तमान स्वास्थ्य ढांचा आज भी बेहद जर्जर है। गंभीर मरीजों को आज भी बेहतर इलाज के लिए सहारनपुर, मेरठ या दिल्ली की दौड़ लगानी पड़ती है। जनता एक आधुनिक ट्रॉमा सेंटर या मल्टी-स्पेशलिटी अस्पताल की राह देख रही थी, लेकिन इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया। इसी तरह, युवाओं के लिए एक राजकीय डिग्री कॉलेज की मांग भी हवा में ही रह गई, जिसकी सुगबुगाहट तक प्रशासन के गलियारों में सुनाई नहीं दी।

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​क्षेत्र की खेल प्रतिभाओं को निखारने के लिए दशकों से एक आधुनिक स्पोर्ट्स स्टेडियम या खेल परिसर की मांग की जा रही है। युवाओं को उम्मीद थी कि मुख्यमंत्री खेल के क्षेत्र में देवबंद को नई पहचान देंगे, लेकिन इस बार भी खेल के मैदान की फाइल फाइलों में ही दबी रही।

​हालांकि, मुख्यमंत्री ने प्राचीन श्री त्रिपुर मां बाला सुंदरी देवी मंदिर को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने और मंदिर मार्ग के सुदृढ़ीकरण की बात कहकर धार्मिक भावनाओं को छूने की कोशिश की, लेकिन स्थानीय बुद्धिजीवियों का मानना है कि ये केवल सौंदर्यीकरण और 'खानापूर्ति' है। जब तक स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसे बुनियादी मुद्दों पर काम नहीं होता, तब तक करोड़ों की इन परियोजनाओं का आम आदमी के जीवन पर कोई बड़ा प्रभाव नहीं पड़ेगा।

रिपोर्ट - दीन रज़ा








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