प्रभाकर जी... क्या आप मुझे भूल गए, या हम आपको भूल बैठे?
- देवबंद की ओर से अपने अमर सपूत कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर' को समर्पित, जेल की सलाखों के पीछे भी जीवित रहा लेखक
- जब कलम ने अंग्रेज़ी हुकूमत को ललकारा, स्वतंत्रता संग्राम, गांधीवादी विचार और जेल-जीवन
मैं आपका वही देवबंद हूँ वही गलियाँ, वही चौक, वही धूल, वही हवा, जिसने आपको अपनी गोद में खिलाया था। आज वर्षों बाद मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूँ। प्रभाकर जी क्या आप मुझे भूल गए? या फिर सच यह है कि हमने ही आपको धीरे-धीरे अपनी स्मृतियों से ओझल होने दिया? मैं आपका वही देवबंद हूँ जहाँ आपने पहली बार आँखें खोलीं, जहाँ आपने अपने भीतर राष्ट्रप्रेम की पहली चिंगारी महसूस की, जहाँ की मिट्टी ने आपके पैरों को चलना सिखाया और जहाँ की हवा ने आपके भीतर सत्य बोलने का साहस जगाया। आज मेरी गलियाँ वैसी तो हैं, पर वैसी नहीं रहीं। लोगों के हाथों में किताबों की जगह मोबाइल हैं। चौपालों की जगह व्हाट्सऐप ग्रुपों ने ले ली है। विचारों की जगह फ़ॉरवर्ड संदेशों ने कब्ज़ा कर लिया है। कलम तो बहुत हैं, पत्रकार भी बहुत हैं, लेकिन स्याही में वह निर्भीकता कम होती जा रही है, जिसके लिए आपने अपना जीवन समर्पित कर दिया था। अगर आप आज देवबंद लौटते, तो शायद सबसे पहले यही पूछते क्या यहाँ अब भी सच लिखा जाता है ?
वह बालक जिसने आगे चलकर इतिहास लिख दिया 29 मई 1906 सहारनपुर जनपद का छोटा-सा कस्बा देवबंद। उस समय भारत अंग्रेज़ी हुकूमत की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था। देश के अनेक हिस्सों में स्वतंत्रता की चेतना जन्म ले रही थी। देवबंद भी केवल धार्मिक शिक्षा का केंद्र नहीं था, बल्कि राष्ट्रीय चेतना का भी एक महत्वपूर्ण स्थल बन रहा था। इसी नगर में एक बालक ने जन्म लिया कन्हैयालाल मिश्र, जो आगे चलकर 'प्रभाकर' नाम से पूरे हिन्दी जगत में प्रसिद्ध हुआ। उस समय किसी ने नहीं सोचा होगा कि यही बालक एक दिन अपनी कलम से लाखों लोगों के विचारों को दिशा देगा, अंग्रेज़ी सत्ता से टकराएगा, जेल जाएगा और स्वतंत्र भारत में हिन्दी पत्रकारिता का एक उज्ज्वल अध्याय लिखेगा।
जब भी देवबंद का नाम लिया जाता है, लोग प्राय: उसकी धार्मिक और शैक्षिक पहचान की चर्चा करते हैं। लेकिन देवबंद की एक और पहचान है राष्ट्रभक्ति, वैचारिक संघर्ष और स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी। यहीं की गलियों में स्वतंत्रता की बातें होती थीं। यहीं ब्रिटिश शासन के अन्याय पर चर्चा होती थी। यही वातावरण उस बालक के व्यक्तित्व को आकार दे रहा था। प्रभाकर जी ने अपने जीवन में कभी देवबंद को केवल जन्मभूमि नहीं माना। उन्होंने उसे अपनी चेतना, अपनी प्रेरणा और अपनी पहचान का आधार माना।
कन्हैयालाल मिश्र बचपन से ही असाधारण संवेदनशील थे। वे केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित नहीं रहे। उन्हें समाज को समझने में रुचि थी। वे लोगों के दुख-दर्द को देखते, प्रश्न पूछते और अन्याय पर मन ही मन विचलित हो जाते। शायद तभी उनकी लेखनी में आगे चलकर आम आदमी का दर्द इतनी सहजता से उतर सका। उनकी भाषा किसी विश्वविद्यालय की कठिन भाषा नहीं थी; वह गाँव, कस्बे और सामान्य भारतीय के जीवन से निकली हुई भाषा थी। बीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक में जब महात्मा गांधी भारतीय राजनीति के केंद्र में आए, तब उनका प्रभाव पूरे देश पर पड़ा।
युवा कन्हैयालाल मिश्र ने जब गांधीजी के सत्य, अहिंसा, स्वदेशी और स्वावलंबन के विचार सुने, तो उन्होंने उन्हें केवल पढ़ा नहीं—जीवन में उतार लिया। उनके लिए राष्ट्रप्रेम केवल भाषण नहीं था। वह जीवन का उद्देश्य बन गया। कलम का पहला संकल्प बहुत से लोग तलवार उठाते हैं। कुछ लोग आंदोलन करते हैं। लेकिन बहुत कम लोग यह समझते हैं कि एक ईमानदार कलम भी क्रांति का सबसे शक्तिशाली हथियार हो सकती है। प्रभाकर जी ने बहुत जल्दी समझ लिया था कि यदि समाज को बदलना है, तो पहले उसके विचार बदलने होंगे। और विचार बदलने का सबसे बड़ा माध्यम है लेखन। यहीं से एक लेखक का जन्म हुआ। यहीं से एक पत्रकार का जन्म हुआ। और यहीं से उस व्यक्तित्व का निर्माण शुरू हुआ जिसे आने वाली पीढ़ियाँ "कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर'" के नाम से जानेंगी।
देवबंद आज आपसे प्रश्न पूछता है प्रभाकर जी... आज मैं आपकी गलियों में चलता हूँ। आपकी स्मृतियाँ तलाशता हूँ। आपके लिखे शब्द ढूँढ़ता हूँ। लेकिन अफसोस नई पीढ़ी में बहुत से युवा आपका नाम तक नहीं जानते। वे यह नहीं जानते कि इसी नगर का एक बेटा कभी अंग्रेज़ी हुकूमत से टकराया था। वे यह नहीं जानते कि पत्रकारिता कभी मिशन हुआ करती थी। वे यह नहीं जानते कि लेखनी बिकती नहीं थी समाज के लिए समर्पित होती थी। शायद इसी कारण आज मैं आपको पुकार रहा हूँ। ताकि आपका परिचय फिर से देवबंद के बच्चों तक पहुँचे। ताकि आपकी कलम की रोशनी फिर से इस नगर की गलियों में लौट सके।
"प्रभाकर जी, आज जब मैं अपनी गलियों से गुजरता हूँ, तो सोचता हूँ—क्या इन्हीं रास्तों से होकर वह युवक भी निकला होगा, जिसने यह तय कर लिया था कि अब उसका जीवन केवल उसका अपना नहीं, बल्कि राष्ट्र का है? देश का बदलता हुआ समय, बदलता हुआ युवा बीसवीं शताब्दी का तीसरा दशक भारत के इतिहास का निर्णायक दौर था। महात्मा गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, स्वदेशी का प्रचार और सविनय अवज्ञा आंदोलन पूरे देश में जनजागरण का माध्यम बन चुके थे।
देवबंद भी इस राष्ट्रीय चेतना से अछूता नहीं था। यहाँ धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ राष्ट्रीय विचारों की भी गूंज सुनाई देती थी। ऐसे वातावरण में पले-बढ़े कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर' के लिए देशसेवा केवल एक आदर्श नहीं, बल्कि जीवन का कर्तव्य बन गई। उन्होंने अंग्रेज़ी शासन की अन्यायपूर्ण नीतियों का विरोध किया और राष्ट्रीय आंदोलन से स्वयं को जोड़ा। उनके लिए स्वतंत्रता केवल राजनीतिक सत्ता परिवर्तन नहीं थी; वह मनुष्य की गरिमा, आत्मसम्मान और विचारों की स्वतंत्रता का प्रश्न भी थी।
महात्मा गांधी का प्रभाकर जी के व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव था उन्होंने सत्य, अहिंसा, सादगी, स्वदेशी और नैतिक जीवन को केवल पढ़ा नहीं, बल्कि अपनाया। वे मानते थे कि स्वतंत्र भारत की नींव केवल राजनीतिक विजय से नहीं, बल्कि चरित्रवान नागरिकों से मजबूत होगी। उनके लेखों में बार-बार सत्य, नैतिकता, आत्मसंयम और जनसेवा का आग्रह दिखाई देता है। यही गांधीवादी दृष्टि आगे चलकर उनकी पत्रकारिता और साहित्य की पहचान बनी कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर' ने राष्ट्रीय आंदोलनों में सक्रिय भाग लिया। ब्रिटिश शासन के विरोध में किए गए उनके कार्यों के कारण उन्हें गिरफ्तार भी किया गया और जेल भी जाना पड़ा। उस दौर में जेल जाना केवल दंड नहीं था, बल्कि स्वतंत्रता सेनानियों के लिए राष्ट्रभक्ति का प्रतीक माना जाता था।
जेल की कठिन परिस्थितियों ने उन्हें तोड़ा नहीं। बल्कि वहीं उनके भीतर यह विश्वास और मजबूत हुआ कि कलम को सत्ता के सामने झुकना नहीं चाहिए। उनका संघर्ष यह संदेश देता है कि स्वतंत्रता केवल रणभूमि में नहीं, विचारों के क्षेत्र में भी जीती जाती है। कई स्वतंत्रता सेनानियों की तरह प्रभाकर जी ने भी जेल को केवल कैद नहीं माना। उन्होंने कठिनाइयों के बीच भी अपने विचारों को जीवित रखा। वे समझ चुके थे कि अंग्रेज़ किसी व्यक्ति को कैद कर सकते हैं, लेकिन विचारों को नहीं। यही कारण है कि स्वतंत्रता के बाद भी उनकी लेखनी में वही निर्भीकता दिखाई देती है, जो संघर्ष के दिनों में थी।
प्रभाकर जी के लिए पत्रकारिता कभी रोजगार नहीं रही। वह एक मिशन थी। वे मानते थे कि पत्रकार का पहला कर्तव्य जनता के प्रति है, किसी सत्ता, दल या व्यक्ति के प्रति नहीं। उन्होंने ऐसे समय में सच लिखने का साहस दिखाया जब सच बोलना ही अपराध माना जाता था। उनके लेख केवल समाचार नहीं होते थे; वे समाज से संवाद करते थे, प्रश्न पूछते थे और पाठकों को सोचने के लिए विवश करते थे। देवबंद की ओर से एक प्रश्न प्रभाकर जी यदि आप आज लौटकर किसी समाचार कक्ष में जाएँ, तो क्या देखेंगे? तेज़ी से बदलती खबरें
सोशल मीडिया की प्रतिस्पर्धा और शायद कहीं पीछे छूटता हुआ सत्य। आपने जिस पत्रकारिता को जनसेवा का माध्यम बनाया था, आज वह कई जगह बाज़ार के दबावों से जूझ रही है। लेकिन फिर भी आज भी कुछ पत्रकार ऐसे हैं जो आपकी परंपरा को जीवित रखे हुए हैं। वे कम हैं, पर हैं। वे जानते हैं कि पत्रकारिता की असली ताकत किसी बड़े मंच में नहीं, बल्कि जनता के विश्वास में होती है स्वतंत्रता केवल 15 अगस्त नहीं है प्रभाकर जी कहा करते थे—स्वतंत्रता का अर्थ केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर से भय, अन्याय, अज्ञान और नैतिक पतन को दूर करना भी है।
आज भारत स्वतंत्र है। लेकिन क्या समाज हर प्रकार के भय और अन्याय से मुक्त हो गया है? क्या पत्रकार पूरी स्वतंत्रता से सच लिख पा रहा है? क्या नागरिक अपने कर्तव्यों के प्रति उतना ही सजग है जितना अपने अधिकारों के प्रति? ये प्रश्न आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने स्वतंत्रता आंदोलन के दिनों में थे। देवबंद की पुकार प्रभाकर जी... आज मैं आपकी प्रतीक्षा इसलिए नहीं कर रहा कि आप फिर से अंग्रेज़ों से लड़ें। मैं चाहता हूँ कि आपकी लेखनी का साहस लौट आए। आपकी सत्यनिष्ठा लौट आए। आपकी नैतिकता लौट आए। आजादी की लड़ाई जीत ली गई है, लेकिन सच, ईमानदारी और सामाजिक चेतना की लड़ाई अब भी जारी है और इस लड़ाई में आपकी कलम आज भी हमारी राह रोशन कर सकती है।
(क्रमशः – अगले भाग में प्रभाकर जी की पत्रकारिता, उनकी प्रमुख कृतियाँ, साहित्यिक शैली, पद्मश्री सम्मान और हिन्दी साहित्य में उनका स्थायी योगदान।

