मस्जिद वैध थी या नहीं? और उसे गिराने की प्रक्रिया सही थी या नहीं? दो सवाल, और प्रोपेगेंडा
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- पहले मस्जिद बनी थी या कलेक्ट्रेट तामीर हुआ था? कुएं से मंदिर तक की कहानी? सवाल पूछिए, निष्कर्ष मत गढ़िए
देवबंद। देवबंद और सहारनपुर सहित प्रदेश और देश की मीडिया कवरेज देखने के बाद कुछ कहने या सुनने की आवश्यकता बचती तो नहीं है। लेकिन पाठकों ने जो प्रतिक्रियाएं और सवाल छोड़े हैं, उनका विश्लेषण सही समय आने पर किया जाएगा। अभी एक सवाल आप सभी से है क्या इन तथाकथित कौम के ठेकेदारों की राजनीति आपको समझ आ रही है या नहीं? किसी भी मुद्दे के देशभर में चर्चा में आने के बाद बहुत-सी किस्से-कहानियां गर्दिश करने लगती हैं, जिनका असली मुद्दे से कोई लेना-देना नहीं होता। सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर की मस्जिद का मामला भी अब इसी तरह की बहसों से घिरता जा रहा है।
लेकिन इस पूरे विवाद में सबसे पहले दो सवालों का जवाब जरूरी है पहला मस्जिद वैध थी या नहीं? दूसरा अगर प्रशासन के अनुसार वह अनधिकृत थी, तो उसे गिराने की प्रक्रिया सही थी या नहीं? इन दो सवालों के बीच ही इस पूरे मामले की असली सच्चाई छिपी है पहले मस्जिद बनी थी या कलेक्ट्रेट तामीर हुआ था? मस्जिद पक्ष लंबे समय से दावा करता रहा है कि यह कोई नई इमारत नहीं, बल्कि पुरानी धार्मिक इमारत है। परिवार की ओर से पुराने दस्तावेज और करीब 1911 के निर्माण संबंधी दावे भी सामने आए हैं। अब ध्वस्तीकरण के बाद मलबे से एक ईंट की तस्वीर सामने आई है, जिस पर 1909 के अंक होने का दावा किया जा रहा है। लेकिन यहां एक बात साफ समझनी होगी अगर ईंट पर 1909 अंकित होना प्रमाणित भी हो जाए, तो उससे अकेले मस्जिद के निर्माण वर्ष की अंतिम पुष्टि नहीं होती। ईंट किसी पुराने निर्माण से दोबारा इस्तेमाल भी हो सकती है। इसलिए इस तस्वीर को “पुरानियत का दावा मजबूत करने वाली सामग्री” कहा जा सकता है इसी तरह, ध्वस्तीकरण के बाद परिसर में पुराने कुएं के अवशेष मिलने की खबर भी सामने आई है। रिपोर्टों के अनुसार कुआं करीब 20 फीट गहरा और लगभग 1.5 मीटर चौड़ा बताया गया है। प्रशासन ने इसके ऐतिहासिक महत्व की जांच के लिए एएसआई को सूचना देने की बात कही है। कुएं की वास्तविक उम्र और मस्जिद से उसका संबंध अभी जांच का विषय है।
यानी सवाल यह नहीं होना चाहिए कि सोशल मीडिया पर किसने क्या दावा कर दिया। सवाल यह होना चाहिए कि क्या पुराने दस्तावेज, जमीन के अभिलेख, निर्माण की तारीख और कलेक्ट्रेट परिसर के इतिहास को एक साथ रखकर निष्पक्ष जांच की गई प्रशासन का कहना है कि मस्जिद सरकारी जमीन पर अनधिकृत निर्माण थी। सिटी मजिस्ट्रेट ने जुलाई में उत्तर प्रदेश सार्वजनिक परिसर (अनधिकृत अधिवासियों का निष्कासन) अधिनियम, 1972 के तहत बेदखली का आदेश दिया था। मस्जिद प्रबंधन की अपील जिला अदालत ने 2 सितंबर को खारिज कर दी। इसके बाद 5 सितंबर को ध्वस्तीकरण की कार्रवाई हुई। प्रशासन का दावा है कि सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया गया।
लेकिन यहीं दूसरा सवाल खड़ा होता है। क्या बेदखली का आदेश और ध्वस्तीकरण का आदेश एक ही बात है? मस्जिद के मुतवल्ली की ओर से यह आपत्ति सामने आई है कि प्रशासन ने बेदखली की कार्रवाई के आधार पर ध्वस्तीकरण किया, जबकि ध्वस्तीकरण का अलग आदेश नहीं था। मस्जिद पक्ष ने यह भी कहा है कि उसे उचित कानूनी अवसर नहीं मिला और मामले को हाईकोर्ट में चुनौती दी जाएगी।
क्या अदालत के आदेश में वास्तव में ध्वस्तीकरण का निर्देश था, या केवल बेदखली का? अगर आदेश में ध्वस्तीकरण का स्पष्ट अधिकार था, तो प्रशासन का पक्ष मजबूत होगा। लेकिन अगर आदेश केवल परिसर खाली कराने तक सीमित था, तो ध्वस्तीकरण की प्रक्रिया की स्वतंत्र कानूनी समीक्षा जरूरी होगी। अदालत का आदेश होना और प्रशासन द्वारा उठाया गया हर कदम स्वतः सही होना—दो अलग बातें हैं। ध्वस्तीकरण की कार्रवाई सुबह के समय की गई। विपक्षी नेताओं ने सवाल उठाया कि इतनी संवेदनशील धार्मिक इमारत को तड़के क्यों गिराया गया। प्रशासन का कहना है कि कार्रवाई अदालत के आदेश के अनुपालन में हुई और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सुरक्षा व्यवस्था की गई।
यहां भी सवाल भावनाओं से नहीं, नियमों से पूछा जाना चाहिए क्या कार्रवाई का समय कानून के अनुरूप था? क्या प्रभावित पक्ष को पर्याप्त सूचना दी गई? क्या अपील या न्यायिक राहत का कोई अवसर बाकी था? क्या ध्वस्तीकरण से पहले वैकल्पिक समाधान पर विचार हुआ? क्या सुरक्षा व्यवस्था वास्तव में कानून-व्यवस्था के लिए थी, या राजनीतिक गतिविधियों को रोकने के लिए? नेताओं की ओर से हाउस अरेस्ट या पुलिस रोकने के आरोप सामने आए हैं इस मामले में मस्जिद पक्ष का सबसे मजबूत सवाल यह है कि अगर इमारत पुरानी थी, पुराने दस्तावेज मौजूद थे और जमीन का इतिहास विवादित था, तो क्या ध्वस्तीकरण से पहले उन सभी दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच हुई? यह सवाल किसी धर्म के पक्ष में खड़ा होना नहीं है। यह सवाल कानून के शासन के पक्ष में खड़ा होना है। अगर कोई निर्माण अवैध है, तो उसे हटाया जा सकता है। लेकिन अगर उसकी वैधता, जमीन का स्वामित्व, ऐतिहासिक अस्तित्व और प्रशासनिक प्रक्रिया विवादित है, तो उन सवालों का जवाब देना भी प्रशासन की जिम्मेदारी है। किसी धार्मिक स्थल को गिराने से पहले प्रशासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कार्रवाई केवल कानूनी रूप से ही नहीं, बल्कि पारदर्शी और न्यायसंगत भी हो।
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यह भी सच है कि विपक्षी दलों ने इस मामले पर बयान दिए हैं लेकिन जनता का सवाल यह है कि क्या केवल बयान, प्रतिनिधिमंडल और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से मस्जिद पक्ष को वास्तविक न्याय मिलेगा? अगर विपक्ष वास्तव में इस मामले को गंभीरता से लेना चाहता है, तो उसे चाहिए कि अदालत के आदेशों की प्रमाणित प्रतियां सार्वजनिक करे मस्जिद पक्ष के दस्तावेजों की स्वतंत्र जांच कराए, ध्वस्तीकरण की प्रक्रिया पर कानूनी विशेषज्ञों की राय सामने रखे, प्रशासन से लिखित जवाब मांगे, और यदि प्रक्रिया में गलती हुई है, तो उसे अदालत में चुनौती दे।
मस्जिद के मलबे में कुआं मिलने की खबर के बाद सोशल मीडिया पर एक नया नैरेटिव तेजी से उभरता दिखाई दे रहा है कुआं मिला है, तो मंदिर रहा होगा। लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी पुराने कुएं की मौजूदगी अपने-आप किसी धार्मिक स्थल के अस्तित्व का प्रमाण बन जाती है? अगर ऐसा है, तो फिर इतिहास और पुरातत्व की पूरी प्रक्रिया को ही किनारे कर दीजिए। हर कुआं मंदिर का प्रमाण नहीं होता और हर पुरानी ईंट किसी धार्मिक दावे की मुहर नहीं होती। कुएं का निर्माण कब हुआ, किसने कराया, उसका इस्तेमाल किस लिए होता था और उसका मस्जिद से क्या संबंध था—इन सवालों का जवाब जांच से मिलेगा, सोशल मीडिया के निष्कर्षों से नहीं।
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इस मामले में मस्जिद पक्ष पुराने दस्तावेजों का हवाला दे रहा है। प्रशासन अपनी कार्रवाई को सरकारी जमीन, अनधिकृत निर्माण और न्यायिक आदेशों से जोड़ रहा है। ऐसे में निष्पक्ष पत्रकारिता का काम यह होना चाहिए कि दोनों पक्षों के दस्तावेज सामने रखे जाएं और उनकी जांच कराई जाए। लेकिन अगर सरकारी अभिलेखों पर सवाल उठाए जा रहे हैं और दूसरी ओर किसी ईंट, कुएं या अधूरी तस्वीर को तुरंत ऐतिहासिक प्रमाण मान लिया जा रहा है, तो यह दोहरा मापदंड क्यों नहीं माना जाना चाहिए? किसी भी दावे को प्रमाण बनने के लिए जांच से गुजरना होगा चाहे दावा मस्जिद पक्ष का हो या दूसरे पक्ष का।
कुआं मिला, इसलिए मंदिर था क्या यही अब इतिहास लिखने का तरीका है? भारत में सदियों से कुएं पानी की जरूरत पूरी करने का महत्वपूर्ण साधन रहे हैं। धार्मिक स्थलों, बस्तियों और सार्वजनिक स्थानों के आसपास कुएं होना कोई असाधारण बात नहीं है। इसलिए किसी कुएं की मौजूदगी को सीधे किसी एक धर्म से जोड़ देना ऐतिहासिक निष्कर्ष नहीं, बल्कि अनुमान है। अगर कुएं की उम्र और इतिहास की जांच होनी है, तो होने दीजिए। अगर पुरातत्व विभाग को इसकी जांच करनी है, तो रिपोर्ट आने दीजिए। लेकिन जांच से पहले फैसला सुनाने की जल्दी क्यों?
पत्रकारों से भी एक सवाल इस मामले में कुछ सवाल जिस अंदाज में पूछे जा रहे हैं, वे भी चर्चा का विषय हैं। सवाल पूछना पत्रकार का अधिकार है, लेकिन सवाल के भीतर ही निष्कर्ष छिपा देना पत्रकारिता नहीं है। मसलन, अगर सवाल यह हो कि “कुआं मिला है, क्या इसका मतलब मंदिर था?” तो पत्रकार को अगला सवाल भी पूछना चाहिए यही असली पत्रकारिता है दावे को सवाल में बदलना, सवाल को निष्कर्ष में नहीं। इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण सवाल अभी भी वही हैं क्या मस्जिद वैध थी या नहीं? और अगर प्रशासन के अनुसार वह अनधिकृत थी, तो उसे गिराने की प्रक्रिया सही थी या नहीं? इन सवालों के जवाब दस्तावेजों, अदालत के आदेशों और कानूनी प्रक्रिया से मिलेंगे। कुएं, ईंट और सोशल मीडिया की अटकलों से नहीं।

