देवबंद का 'समद पोक्सो कनेक्शन'! पहले नाबालिग को बनाया हथियार, अब आरोपी को बचाने के लिए ईमानदार SSI पर रचा गया 'रिश्वत' का खेल?
- खाकी को बदनाम करने की साजिश बेनकाब! 'सेटिंग' नहीं हुई तो सोशल मीडिया पर शुरू हुआ प्रोपेगैंडा, पोक्सो केस में आरोपी को बचाने की कोशिशों पर उठे बड़े सवाल
- जेल भिजवाने वाले ही अब बचाने में क्यों जुटे? देवबंद के चर्चित पोक्सो मामले में सामने आईं चौंकाने वाली परतें, दलाली गैंग की भूमिका पर गंभीर चर्चा
देवबंद। सोशल मीडिया की दुनिया में सच और झूठ के बीच की दूरी अक्सर बहुत कम रह जाती है। कई बार जो लोग खुद को निष्पक्ष पत्रकारिता और समाज सेवा का चेहरा बताकर पेश करते हैं, उन्हीं के ऊपर पर्दे के पीछे सौदेबाजी, दबाव और दलाली के आरोप लगते दिखाई देते हैं। देवबंद में सामने आया एक चर्चित पोक्सो मामला इन दिनों इसी वजह से चर्चा का विषय बना हुआ है। मामला एक नाबालिग किशोरी से जुड़ा बताया जा रहा है। फरवरी माह में देवबंद क्षेत्र में शादी का झांसा देकर नाबालिग से दुष्कर्म का मामला सामने आया था। उस समय कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर लगातार पोस्ट और अभियान चलाकर मामले को प्रमुखता से उठाया था। पीड़िता के पक्ष में आवाज बुलंद की गई और आरोपी के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की गई।
पुलिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए कार्रवाई करते हुए मुख्य आरोपी समद पुत्र अफजल निवासी वरदान सिटी, देवबंद को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। पोक्सो एक्ट जैसे गंभीर कानून के तहत दर्ज मुकदमे में आरोपी की गिरफ्तारी को उस समय बड़ी कार्रवाई माना गया था। लेकिन अब इसी मामले में एक नया मोड़ सामने आने की चर्चाएं तेज हैं। स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि जो लोग पहले पीड़िता के हितैषी बनकर सामने आए थे, उन्हीं में से कुछ लोग बाद में आरोपी पक्ष के संपर्क में दिखाई दिए। आरोप हैं कि आरोपी को कानूनी राहत दिलाने और मामले को कमजोर करने के लिए विभिन्न स्तरों पर कोशिशें की गईं।
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सूत्रों के अनुसार कुछ लोगों द्वारा पुलिस पर दबाव बनाने का प्रयास किया गया कि मामले में ऐसी रिपोर्ट तैयार की जाए जिससे आरोपी को राहत मिल सके। चर्चा यह भी है कि मामले में कथित रूप से 'सेटिंग' कराने के प्रयास हुए, लेकिन संबंधित पुलिस अधिकारी ने किसी भी प्रकार के दबाव या कथित प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। यहीं से पूरा घटनाक्रम नया मोड़ लेता दिखाई देता है। बताया जाता है कि जब कथित प्रयास सफल नहीं हुए तो सोशल मीडिया पर पुलिस अधिकारी के खिलाफ आरोपों की मुहिम शुरू कर दी गई। विभिन्न प्लेटफॉर्मों पर ऐसे संदेश प्रसारित किए गए जिनमें संबंधित एसएसआई पर रिश्वत लेने और चार्जशीट के नाम पर दबाव बनाने जैसे आरोप लगाए गए।
हालांकि इन आरोपों के दावों को प्रमाणित नही किया गया है लेकिन इतना जरूर है कि पूरे मामले ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर जो लोग शुरुआत में आरोपी के खिलाफ सबसे ज्यादा मुखर थे, वे बाद में आरोपी को राहत दिलाने की चर्चाओं में क्यों दिखाई दिए? सोशल मीडिया पर अचानक पुलिस के खिलाफ अभियान क्यों शुरू हुआ? और यदि आरोप लगाए गए हैं तो उनके समर्थन में ठोस प्रमाण कहां हैं? स्थानीय नागरिकों का कहना है कि पोक्सो जैसे संवेदनशील मामलों को किसी भी प्रकार की सौदेबाजी या व्यक्तिगत हितों का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए। यदि किसी पुलिस अधिकारी पर आरोप हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, लेकिन यदि आरोप झूठे हैं तो ऐसे लोगों के खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए जो सोशल मीडिया को हथियार बनाकर किसी की छवि धूमिल करने का प्रयास करते हैं।
फिलहाल यह मामला देवबंद में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। लोगों की निगाहें पुलिस प्रशासन और उच्च अधिकारियों की आगामी कार्रवाई पर टिकी हैं। आने वाले दिनों में जांच और तथ्यों के आधार पर ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि सच कौन बोल रहा है और किसने किस उद्देश्य से यह पूरा विवाद खड़ा किया है।
पोक्सो जैसे मामलों में सबसे पहली प्राथमिकता पीड़ित को न्याय दिलाना होनी चाहिए, न कि किसी आरोपी को बचाने या किसी अधिकारी को बदनाम करने की राजनीति। यदि कोई व्यक्ति या समूह सच में न्याय चाहता है तो उसे तथ्यों और कानून के साथ खड़ा होना चाहिए। लेकिन यदि किसी की दिलचस्पी केवल दबाव, सौदेबाजी और प्रचार में है, तो ऐसे चेहरों को समाज के सामने बेनकाब होना ही चाहिए। न्याय की लड़ाई सोशल मीडिया के शोर से नहीं, बल्कि सच्चाई और कानून के आधार पर जीती जाती है।

