सहारनपुर सार्वजनिक जमीनों पर अवैध निर्माणों के खिलाफ खुली कानूनी जंग, 45 साल के तजुर्बेकार वकील ने डीएम को सौंपी पूरी फेहरिस्त
- चंदा वसूली और व्यावसायिक गतिविधियों का आरोप, सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों की दी नज़ीर, कठोर कार्रवाई और आर्थिक दंड की मांग
सहारनपुर | उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जनपद में सार्वजनिक जमीनों, सड़कों और सरकारी संपत्तियों पर दशकों से हो रहे कथित अवैध कब्जों के खिलाफ एक बड़ा कानूनी कदम उठाया गया है। ऑल इंडिया मायनोरिटीज एडवोकेट्स वेलफेयर एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष और 45 वर्षों से वकालत कर रहे 72 वर्षीय वरिष्ठ अधिवक्ता मोहम्मद अली ने इस संबंध में जिलाधिकारी (डीएम) सहारनपुर को एक विस्तृत शिकायती पत्र सौंपा है।
शिकायतकर्ता ने स्पष्ट किया है कि इस पत्र का उद्देश्य किसी विशेष वर्ग या धर्म की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं, बल्कि संविधान, कानून व्यवस्था और लोकतंत्र को मजबूत करना है। शिकायती पत्र में आरोप लगाया गया है कि पिछले 30–35 वर्षों से जिले में मुख्य मार्गों, फुटपाथों और सार्वजनिक स्थलों पर अवैध निर्माण खड़े किए जा रहे हैं। कई स्थानों पर इन निर्माणों की आड़ में ट्रस्ट बनाकर बड़े पैमाने पर चंदा व चढ़ावा जुटाया जा रहा है और दुकानें बनाकर व्यावसायिक गतिविधियां चलाई जा रही हैं। शिकायतकर्ता के अनुसार, प्रशासन की निष्क्रियता के कारण 'उत्तर प्रदेश सार्वजनिक परिसर (अवैध कब्जादारों को बेदखल करना) अधिनियम 1972' निष्प्रभावी साबित हो रहा है।
शिकायत में देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) के तीन प्रमुख फैसलों का हवाला देते हुए तुरंत बेदखली की मांग की गई है यूनियन ऑफ इंडिया बनाम गुजरात राज्य (2009): सुप्रीम कोर्ट का कड़ा निर्देश है कि सार्वजनिक सड़कों, पार्कों या खुले स्थानों पर कोई भी अनाधिकृत निर्माण नहीं होना चाहिए। सभी जिलाधिकारियों को ऐसे मामलों में त्वरित समीक्षा कर आदेश का अनुपालन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया था।
जोगिन्दर सिंह बनाम हरियाणा राज्य (2021): शीर्ष अदालत ने व्यवस्था दी है कि सरकारी जमीन पर कब्जे की लंबी अवधि या उस पर किए गए निर्माण को किसी भी तरह से जायज़ नहीं ठहराया जा सकता। सार्वजनिक संपत्ति जनहित के लिए है और उसकी रक्षा करना राज्य का कर्तव्य है। जगपाल सिंह बनाम पंजाब राज्य (2011): न्यायालय ने साफ किया था कि सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे को हटाने के लिए किसी का राजनीतिक प्रभाव या निर्माण में हुआ खर्च कोई कानूनी ढाल नहीं बन सकता।
पत्र में यह भी रेखांकित किया गया है कि ये सभी निर्माण वर्ष 1947 के बाद के हैं, इसलिए इन पर उपासना स्थल अधिनियम (Places of Worship Act, 1991) लागू नहीं होता। प्रार्थना पत्र के साथ संलग्न तस्वीरों और जीपीएस लोकेशन के आधार पर शहर के कई संवेदनशील व व्यस्त इलाकों का ब्योरा प्रशासन को दिया गया है कलेक्ट्रेट कोर्ट परिसर: हकीकत नगर रोड स्थित स्थल, जहाँ लाखों रुपये के दान-चंदे का आरोप है।
रेलवे स्टेशन व लकड़ी का पुल रेलवे की सार्वजनिक भूमि पर कई निर्माण और उनके सहारे खड़ी दुकानें, जिसके चलते यातायात लगातार बाधित रहता है। नुमाइश कैंप (कंपनी बाग के सामने): मुख्य सड़क पर कब्जा कर व्यवस्था बनाने से प्रदूषण और जाम की गंभीर समस्या। किशनपुरा नाला पटरी: कैगी नाले को पाटकर किए गए निर्माण और संकरे होते रास्ते। हलालपुर व चिलकाना रोड: ग्राम समाज और जोहड़ (तालाब) की जमीन पर जारी कथित अवैध कब्जे। शहीद गंज बाजार व नेहरू मार्केट: बाजारों की व्यस्त सड़कों पर अतिक्रमण और नेहरू मार्केट स्थित जुबली पार्क की करोड़ों की भूमि पर दुकानें आगे बढ़ाकर किए गए निर्माण।
वरिष्ठ अधिवक्ता मोहम्मद अली ने जिलाधिकारी से मांग की है कि पूरे मामले की सूक्ष्मता से जांच कराई जाए, सार्वजनिक भूमि से सभी प्रकार के अवैध अतिक्रमण हटाए जाएं और कानून का उल्लंघन करने वालों से नियमानुसार आर्थिक दंड (जुर्माना) भी वसूला जाए। अब देखना यह होगा कि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट दिशा-निर्देशों और इस विस्तृत रिपोर्ट के बाद सहारनपुर जिला प्रशासन इन सार्वजनिक संपत्तियों को मुक्त कराने के लिए क्या ठोस कदम उठाता है।
















