41 दिन अग्नि के बीच तपस्या पूरी, महंत राकेश राणा बने ‘लोकनाथ जी महाराज’; नाथ संप्रदाय को दिया सामाजिक बदलाव का संदेश
- तीन माह की उम्र में चढ़े थे धूने पर, आज पंचधुनि तपस्या कर बने लोकनाथ जी महाराज; जाति-पाति और नशे के खिलाफ बुलंद की आवाज
- साधु बनने के बाद भी अगर ऊंच-नीच का भेद रहे तो ऐसी जिंदगी पर थू! लोकनाथ जी महाराज का नाथ समाज को बड़ा संदेश
देवबंद। आध्यात्मिक साधना, तप और त्याग की भूमि पर एक बार फिर ऐसी तपस्या पूर्ण हुई है, जिसने क्षेत्र ही नहीं बल्कि पूरे नाथ संप्रदाय का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। देवबंद क्षेत्र के अमरपुर स्थित गुरु गोरखनाथ आश्रम में 41 दिनों तक पंचधुनि अग्नि तपस्या करने वाले महंत राकेश राणा अब आधिकारिक रूप से लोकनाथ जी महाराज के नाम से जाने जाएंगे। अग्नि की लपटों के बीच 41 दिनों तक कठिन साधना पूरी करने के बाद लोकनाथ जी महाराज ने न केवल आध्यात्मिक उन्नति का संदेश दिया, बल्कि नाथ संप्रदाय के भीतर व्याप्त जाति-पाति, ऊंच-नीच और भेदभाव जैसी कुरीतियों पर भी खुलकर अपनी पीड़ा व्यक्त की।
पंचधुनि तपस्या नाथ संप्रदाय और सनातन साधना की सबसे कठिन तपस्याओं में से एक मानी जाती है। इसमें साधक चारों दिशाओं में अग्नि जलाकर और एक अग्नि अपने मध्य में रखकर कठोर तप करता है। इस साधना का उद्देश्य केवल शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि मन, वाणी और इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण प्राप्त करना होता है। अग्नि को साक्षी मानकर की जाने वाली यह तपस्या आत्मशुद्धि, आत्मबल और ईश्वर से निकटता का मार्ग मानी जाती है।
लोकनाथ जी महाराज बताते हैं कि उनका सांसारिक नाम राकेश राणा पुत्र कालूराम भगत है। उनका कहना है कि जन्म के मात्र तीन महीने बाद ही उनके माता-पिता ने उन्हें धूने पर चढ़ा दिया था और तभी से उनका जीवन नाथ संप्रदाय की साधना और सेवा को समर्पित हो गया। उन्होंने बताया कि उनके गुरु श्री गुरु प्रेमनाथ जी महाराज हैं और उनका पंथ भर्तहरी वैराग है, जबकि उनका मूल आध्यात्मिक केंद्र गोरख टीला, राजस्थान है। वर्तमान में वे गुरु गोरखनाथ आश्रम, अमरपुर नैन, देवबंद (जनपद सहारनपुर) में साधना और सेवा कार्य कर रहे हैं।
लोकनाथ जी महाराज के अनुसार नाथ संप्रदाय का वास्तविक उद्देश्य केवल भगवा वस्त्र धारण करना नहीं, बल्कि अपने मन, वाणी और इंद्रियों पर नियंत्रण स्थापित करना है। उन्होंने कहा कि नाथ परंपरा प्रेम, भाईचारे, सद्भावना और ईश्वर भक्ति का संदेश देती है। यह संप्रदाय लोभ, मोह, अहंकार, जातिवाद और ऊंच-नीच से दूर रहने की शिक्षा देता है। उन्होंने विशेष रूप से युवाओं से अपील करते हुए कहा कि समाज को सुल्फा, गांजा, भांग, धतूरा और अन्य नशीले पदार्थों से दूर रहना चाहिए और साधुओं को भी इन बुराइयों से स्वयं दूर रहकर समाज को सही दिशा दिखानी चाहिए।
लोकनाथ जी महाराज ने कहा कि नाथ संप्रदाय केवल दीक्षा पर ही नहीं बल्कि शिक्षा पर भी विशेष बल देता है। उनका मानना है कि शिक्षा के माध्यम से ही व्यक्ति अच्छे और बुरे की पहचान कर सकता है तथा समाज को सही दिशा दे सकता है। इसलिए हर साधु और हर युवा को शिक्षा का महत्व समझना चाहिए। 41 दिन की कठिन तपस्या पूरी करने के बाद लोकनाथ जी महाराज ने सबसे बड़ा और सबसे मार्मिक संदेश नाथ समाज के नाम दिया।
उन्होंने कहा कि आज भी नाथ संप्रदाय के कुछ हिस्सों में जाति-पाति और ऊंच-नीच का भेदभाव देखने को मिलता है, जो बेहद दुखद है। उनका कहना है कि नाथ परंपरा में केवल गुरु और शिष्य, दरशनी और ओघड़ के बीच सम्मान और प्रेम का रिश्ता होना चाहिए। साधु बनने के बाद किसी भी प्रकार का जातीय भेदभाव नाथ परंपरा की मूल भावना के विपरीत है। यदि कोई व्यक्ति भगवा वस्त्र धारण करने और फकीरी अपनाने के बाद भी अपने अंदर जाति-पाति और ऊंच-नीच का भेदभाव रखता है, तो ऐसी साधना और ऐसे जीवन का कोई अर्थ नहीं रह जाता।"
41 दिन की पंचधुनि तपस्या केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मसंयम, समाज सुधार और आध्यात्मिक जागरण का संदेश है। लोकनाथ जी महाराज ने अपनी साधना के माध्यम से यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि सच्चा साधु वही है जो प्रेम, समानता, शिक्षा और मानवता का मार्ग अपनाए। आज जब समाज नशे, भेदभाव और आपसी वैमनस्य जैसी समस्याओं से जूझ रहा है, तब ऐसी तपस्याएं केवल धार्मिक नहीं बल्कि सामाजिक चेतना का भी माध्यम बन सकती हैं।
रिपोर्ट: दीन रज़ा

