जब 'मूर्खतंत्र' ने रोकी मुफ्त की मलाई, तो सिंघम बन सड़कों पर उतरा वर्दी-तंत्र!
- मलाई-चाय का बिल क्या मांगा, सिंघम बन गया वर्दी-तंत्र; होशियारचंद की सीख मूर्खतंत्र को पड़ी भारी!
- बिल्लियों की लड़ाई का 'बंदर' हुआ भूखा, तो मूर्खतंत्र पर टूटा कानून का डंडा; एक थाल मटन और सियासत सौ ग्राम
देवबंद। यह कहानी किसी काल्पनिक लोक की नहीं, बल्कि अपने जाने-पहचाने देवबंद के लोक-तंतर की है। इस लोक-तंतर का एक सबसे बड़ा, भोला और आत्ममुग्ध समाज था, जिसे लोग 'मूर्खतंत्र' कहते थे। इस लोक-तंतर में जब-जब विवाद की चिंगारी सुलगती, तो दोनों पक्ष न्याय की उम्मीद में 'वर्दी-तंत्र' की चौखट पर नाक रगड़ने पहुंच जाते। फिर क्या? वर्दी-तंत्र दो बिल्लियों की लड़ाई में 'बंदर' की भूमिका निभाता। वह तराजू लेकर बैठता, इंसाफ के नाम पर पूरी रोटी खुद ही हजम कर जाता और इस तरह विवाद का 'द एंड' कर देता कि न बांस बचता, न बांसुरी। यह कहानी शायद आपको सुनी-सुनाई लगे, लेकिन जनाब, मुहम्मद रफ़ी और लता मंगेशकर के नगमे जितनी बार सुनो, उतना ही रूह को सुकून देते हैं। तो बस, इस सियासी और प्रशासनिक जुगलबंदी का भी बार-बार आनंद लीजिए!
वार्ड 17 में विकास कार्यों की मांग तेज़,सभासद ने बोर्ड बैठक के लिए सौंपी 7 सूत्रीय मांगों की लिस्ट
बात करें हमारे 'मूर्खतंत्र' की, तो एक दिन उसकी खोपड़ी में अचानक यह दिव्य ज्ञान उतरा कि देवबंद जैसे लजीज मिजाज वाले शहर में अगर कोई चीज सोने के भाव बिक सकती है, तो वो है 'भोजन'—और वो भी ठेठ मांसाहारी! बस फिर क्या था, यह बात आग की तरह फैली। मूर्खतंत्र ने 'भीड़तंत्र' की तर्ज पर कमर कसी। ख़ानक़ाह, दीवान, ईदगाह रोड... शहर का कोई कोना नहीं छोड़ा। गली-मोहल्ले, सड़क, बेसमेंट से लेकर तीसरी मंजिल तक, हर तरफ मांसाहारी भोजनालयों की बाढ़ आ गई। हर तरफ मसालों की खुशबू और धुएं का गुबार था। लेकिन कहानी में ट्विस्ट तब आया, जब एक दोपहर कुछ 'बजरंगी भाईजान' ख़ानक़ाह स्थित एक नामचीन मांसाहारी भोजनालय पर स्वाद बदलने पधारे। अब मूर्खतंत्र के उस मासूम (या कहें कि महामूर्ख) दुकानदार को क्या पता था कि 'बजरंगी भाईजान' के सामने लजीज खाना परोसना तो आसान है, लेकिन खाने के बाद 'बिल' मांग लेना साक्षात यमराज को न्योता देना है! दुकानदार ने बिल क्या मांगा, भाईजान का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया। नतीजा? देखते ही देखते होटल पर ताला लटक गया।
सगे भाई का घर हड़पने वाले 'हाजी जी' और संगीन धाराओं के आरोपी करेंगे ईदगाह का विकास?
उस वक्त देवबंद के लोक-तंतर में एक हंसते-खेलते व्यापार को सिर्फ इसलिए सूली पर चढ़ा दिया गया क्योंकि वह एक मंदिर के निकट था। लेकिन कमाल की बात देखिए! इतना बड़ा बखेड़ा खड़ा हुआ, शहर सुलगने को हुआ, मगर 'वर्दी-तंत्र' और प्रशासन की तरफ से आज तक कोई अंतिम स्थिति स्पष्ट नहीं की गई सवाल आज भी लोक-तंतर की हवा में तैर रहे हैं: क्या उस भोजनालय के पास FSSAI (भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण) का वैध लाइसेंस नहीं था? क्या नगर पालिका के स्थानीय उप-नियमों (Bye-laws) की धज्जियां उड़ाई जा रही थीं? या फिर किसी 'विशेष रसूखदार' के गुप्त आदेश के तहत सीलिंग की यह एकतरफा कार्रवाई हुई थी?जवाब आज तक नहीं मिला, क्योंकि फाइलों के पन्ने तो वर्दी-तंत्र की फाइलों में दफन हो चुके थे
क्या 'ठग ऑफ देवबंद' और ईदगाह कमेटी, दोनों ही नूरा कुश्ती खेल रहे हैं...?
अब कहानी में एंट्री होती है एक नए किरदार की। करीब एक साल पहले, इसी ख़ानक़ाह के इलाके में एक 'होशियारचंद' आकर रहने लगा था। वह पढ़ा-लिखा और हकों को जानने वाला इंसान था। एक दिन, जब वर्दी-तंत्र के सताए हुए मूर्खतंत्र के कुछ नुमाइंदे अपनी न्याय की गुहार लेकर वर्दी-तंत्र के पास जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाए (क्योंकि शिकायत तो खुद वर्दी-तंत्र की ही थी!), तो वे थक-हारकर होशियारचंद की शरण में पहुंचे। अगुआ ने रोते हुए अपनी व्यथा सुनाई"हुजूर, अब इस शहर में रोजी-रोटी कमाना मुहाल हो गया है। अपने बीवी-बच्चों का पेट पालें या इस वर्दी-तंत्र के अगाध और अंतहीन पेट में मुफ्त का भोजन ठूंसे? सुबह की चाय से लेकर रात के कोरमे तक, सब मुफ्त में सप्लाई करना हमारी मजबूरी बन गया है!
होशियारचंद ने उनकी बात सुनी, चश्मा ठीक किया और कड़क आवाज में कहा"कोई मजबूरी नहीं है! यह तुम्हारा लोकतांत्रिक अधिकार है। अगर वर्दी-तंत्र का कोई भी प्यादा मुफ्त की चाय, दूध या मटन-चिकन मांगे, तो सीधे मना कर दो। अपनी मेहनत की कमाई का एक-एक पैसा वसूलने का हक है तुम्हें! मूर्खतंत्र को लगा कि उन्हें कोई मसीहा मिल गया है। उन्होंने होशियारचंद के शब्दों को ब्रह्मवाक्य मान लिया। अगले ही दिन से वर्दी-तंत्र की 'मुफ्त की रेवड़ी' (फ्री सेवा) पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई।
अब दिन बदले तो मिजाज बदले। कुछ ही दिनों में वर्दी-तंत्र के पेट में चूहे कूदने लगे। उनकी चिंता बढ़ने लगी कि आखिर कल तक जो मूर्खतंत्र एक फोन कॉल पर सुबह से रात तक मुफ्त मलाई-चाय, टकाटक दूध और लजीज पकवानों के थाल सजाकर उनके सामने पेश करता था, आज वो बिना गांधी छाप (पैसों) के बात करने को भी तैयार क्यों नहीं है? मूर्खतंत्र अपनी धुन में मस्त था, मगर वो वर्दी-तंत्र की फितरत से अनजान था। वर्दी-तंत्र को अपनी 'मुफ्तखोरी' की तौहीन बर्दाश्त नहीं हुई। उन्हें होशियारचंद की बात मानना इतना भारी पड़ेगा, इसका अंदाजा मूर्खतंत्र को कतई नहीं था।
क्लाइमेक्स देखिए... आज वर्दी-तंत्र हाथों में कानून का डंडा थामे सड़कों पर है। कानून व्यवस्था के नाम पर दुकानों के शटर धड़ाधड़ गिराए जा रहे हैं। अब न तो कोई नियम देखा जा रहा है, न कोई दलील सुनी जा रही है। वर्दी-तंत्र अपनी लाठी की धमक से मूर्खतंत्र को रह-रहकर वही पुराना इतिहास याद दिला रहा है—"भूल गए क्या... कि 'बजरंगी भाईजान' फिर से आ सकते हैं!
रिपोर्ट - दीन रजा

