सगे भाई का घर हड़पने वाले 'हाजी जी' और संगीन धाराओं के आरोपी करेंगे ईदगाह का विकास?

क्या 'ठग ऑफ देवबंद' और ईदगाह कमेटी, दोनों ही नूरा कुश्ती खेल रहे हैं...? (किस्त 2)

  • सगे भाई का घर हड़पने वाले 'हाजी जी' और संगीन धाराओं के आरोपी करेंगे ईदगाह का विकास?
  • ​यदि भविष्य में इस हठधर्मिता के चलते देवबंद ईदगाह किसी कानूनी विवाद में घिरती है, तो कौन सा गैंग कानूनी पैरवी करेगा? वह जो कानून नहीं मानता, या वह जो कानून नहीं जानता..?
  • ​क्या नगर के सम्मानित डॉक्टर को 'मोहरा' बनाकर, किसी बाहरी व्यक्ति को 'सदर' बनाने की घिनौनी साजिश रच रही थी ईदगाह कमेटी?
  • और क्य़ा ​वक़्फ़ अधिनियम, 1995 के तहत 'स्वतः संज्ञान' के अधिकार के अंतर्गत संबंधित अधिकारी संज्ञान लेंगे, क्योंकि ससुर जी तो दामाद की शिकायत नहीं करेंगे।

देवबंद। बीती किस्त में हम यह विस्तार से स्पष्ट कर चुके हैं कि हम देवबंद ईदगाह को सभी आधुनिक सुविधाओं से लैस और खूबसूरत देखना चाहते हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि इस मुकद्दस काम की आड़ में खेल क्या चल रहा है? जैसा कि हमने पिछली किस्त में इशारा किया था, आज हम खुलकर बताएंगे कि किस प्रकार 'ससुर-दामाद' की जुगलबंदी मिलकर पूरे शहर को मूर्ख बना रही है। 'ठग ऑफ देवबंद' पर दर्ज संगीन मुकदमों की फेहरिस्त पर आने से पहले, इस पूरे गैंग को पर्दे के पीछे से पालने और संरक्षण देने वाले उन तथाकथित समाजसेवियों का बेनकाब होना जरूरी है, जिनके साए में यह चंदा गैंग आज इतना बेखौफ हो चुका है कि दूसरी बार इसने ईदगाह के ताले तोड़कर अपना कब्ज़ा जमा लिया और चंदे का धंधा दोबारा चालू कर दिया।

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आज चंदा गैंग के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाले उन 'हाजी जी' की बात करते हैं, जिन्हें इस तथाकथित 'ठग ऑफ देवबंद' ने खुद ही रातों-रात इंजीनियर, आर्किटेक्ट और विकास प्राधिकरण का सर्वेयर मान लिया है। जनता को यकीन दिलाया जा रहा है कि मिट्टी पर बेतरतीब पड़ी इंटरलॉकिंग टाइल्स जिस 'विशेषज्ञ' की सलाह पर डाली जा रही हैं, उसके आगे देश का कानून, प्रशासन और परमिशन कोई मायने नहीं रखते! आइए, इन हाजी जी के 'विकास पुरुष' होने की पुख्ता हकीकत जान लीजिए, जिसकी चर्चा आज पूरे शहर की जुबान पर आम है शहर में चर्चा है कि इन हाजी जी ने अपने सगे भाई के इंतकाल होते ही (उन्हें दफनाते ही) उनके घर पर अपना एकाधिकार (अवैध कब्ज़ा) जमा लिया था इसकी चर्चा ख़ानक़ाह मे तो बच्चे बच्चे क्क जबान पर है। इसके अतिरिक्त, मोहल्ला खानकाह का दरवाज़ा और बहुत सी जमीनों पर अवैध कब्ज़ा करने का आरोप इन पर मढ़ा जा रहा है। बड़ा सवाल है कि जो हाजी जी खुद भू-माफिया बनकर बैठे हैं और अपनों सगों से लेकर रिश्तेदारों तक को ठगने में माहिर हैं, वे देवबंद ईदगाह का कैसा और कितना विकास करेंगे? यह सोचना देवबंद के नागरिकों का काम है।

क्या 'ठग ऑफ देवबंद' और ईदगाह कमेटी, दोनों ही नूरा कुश्ती खेल रहे हैं...?

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस वक़्फ़ संपत्ति (देवबंद ईदगाह) को इस गिरोह के चंगुल से आखिर कैसे आज़ाद कराया जाए? क्योंकि तकनीकी और व्यावहारिक सच तो यही है कि ससुर जी कभी अपने दामाद जी पर मुकदमा नहीं लिखाएगे और लिखा भी देंगे तो ही क्या फर्क़ पड़ता है यदि भविष्य में इस हठधर्मिता और अवैध निर्माण के चलते देवबंद ईदगाह किसी बड़े कानूनी विवाद में घिरती है या प्रशासन इस पर डंडा चलाता है, तो अदालत में पैरवी कौन सा गैंग करेगा? वह गैंग—जो कानून को मानता ही नहीं? या वह गैंग—जो कानून को जानता ही नहीं?

'ठग ऑफ देवबंद' का इतिहास कोई समाजसेवा का नहीं, बल्कि अपराध और चंदाखोरी का रहा है। पूर्व में दर्ज हुए मुकदमों से इस गैंग ने सिर्फ अपना दायरा बढ़ाया है। वर्तमान में ही इस गैंग के सरगना पर भारतीय दंड संहिता की इन संगीन धाराओं में मुकदमे दर्ज हैं और वह वर्तमान मे ही जेल की हवा भी खा चुका है: धारा 307 – हत्या का प्रयास (जानलेवा हमला) धारा 323 – मारपीट कर चोट पहुंचाना धारा 504 – जानबूझकर अपमान कर शांति भंग करना धारा 506 – जान से मारने की धमकी देना इतना ही नहीं, वर्ष 2023 में भी देवबंद थाने में FIR संख्या 0557 (दिनांक 09/10/2023) दर्ज हुई थी। महमूदुर्रहमान की तहरीर पर दर्ज इस मुकदमे में ठग ऑफ देवबंद के सरदार पर धारा 420 (धोखाधड़ी), 467, 471 (फर्जीवाड़ा/कूटरचना), 386 (जबरन वसूली/रंगदारी), 323, 504 और 506 जैसी धाराएं लगी थीं। इस मुकदमे का क्या परिणाम निकला, यह आज तक कोई नहीं जानता।

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​वहीं बड़ा सवाल अब ईदगाह कमेटी की नीयत और उसकी कार्यप्रणाली को लेकर भी खड़ा होता है। जब किसी बाहरी व्यक्ति को ही ईदगाह कमेटी का सदर (अध्यक्ष) बनाया जाना पहले से तय और प्रस्तावित हो चुका था, तो फिर देवबंद नगर के एक सम्मानित डॉक्टर साहब को अपनी इस घिनौनी साजिश का हिस्सा क्यों बनाया गया? क्या यह उन्हें बदनाम करने और भविष्य में होने वाली हर गड़बड़ी का ठीकरा किसी दूसरे के सिर फोड़ने का एक पक्का और पहले से बुना गया इंतज़ाम था? ​सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि ईदगाह कमेटी के वर्तमान कर्ता-धर्ताओं ने ईदगाह के लिए, बिना किसी लोकतांत्रिक चुनाव के और बिना देवबंद नगर वासियों की सहमति के, बाहरी लोगों को रेवड़ियों की तरह पद बांटने क्यों शुरू कर दिए? क्या ऐतिहासिक नगर देवबंद में एक भी ऐसा काबिल, ईमानदार और बा-असर व्यक्ति नहीं बचा है, जिसे देवबंद ईदगाह का सदर बनाया जा सके? बाहरी लोगों के हाथों में कौम की अमानत सौंपने के पीछे आखिर क्या गुप्त डील हुई है, इसका जवाब कमेटी को देना ही होगा।

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जब देश में सख्त कानूनी व्यवस्था है, तो क्या वक़्फ़ संपत्ति को संरक्षित और सुरक्षित रखने के लिए प्रशासनिक अधिकारियों को स्वतः संज्ञान लेने का कोई अधिकार नहीं है? बिल्कुल है! वक़्फ़ अधिनियम, 1995 के तहत संबंधित अधिकारियों को सीधे दखल देने की पूरी पावर है। चूंकि 'ससुर जी' अपने 'दामाद' की शिकायत करने से रहे, इसलिए अब देवबंद की जनता की निगाहें प्रशासनिक हुक्मरानों पर टिकी हैं। आवाम का सीधा सवाल क्या देवबंद के उप-जिलाधिकारी (SDM), जिलाधिकारी (DM) सहारनपुर, या जिला वक़्फ़ अधिकारी, वक़्फ़ अधिनियम, 1995 के तहत अपने स्वतः संज्ञान' (Suo Motu) के अधिकार का इस्तेमाल करेंगे? क्या वे इस अवैध निर्माण और ताले तोड़ने वाले चंदा गिरोह पर सीधा एक्शन लेकर देवबंद ईदगाह को इस चंगुल से मुक्ति दिलाएंगे या नहीं?

आगामी किस्त में... 

हम बेनकाब करेंगे इस चंदा गैंग के उस पूरे वित्तीय साम्राज्य (Financial Empire) को, जिसकी काली जड़ें देवबंद की गलियों से लेकर बाहर तक फैली हैं! इसके साथ ही होगा बड़ा खुलासा ईदगाह कमेटी के उस तथाकथित 'गठन' का, और उस रहस्यमयी फाइल का... जिसे आगे बढ़ाकर मरहूम हसीब सिद्दीकी ने चुपचाप पूरी ईदगाह ही इन्हें 'दान' में दे दी!

रिपोर्ट - दीन रज़ा 






Deen Raza

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