क्या 'ठग ऑफ देवबंद' और ईदगाह कमेटी, दोनों ही नूरा कुश्ती खेल रहे हैं...?
- क्या देवबंद नगर सहित आसपास के लोगों से ईदगाह के नाम पर 20 लाख से अधिक रुपये स्वाहा कर दिए गए हैं..?
- क्या कौम की अमानत पर कब्ज़े का खेल, सरकारी बुलडोजर को दावत दे रहा है?
- प्रशासनिक सूत्रों से मिली पुख्ता जानकारी के अनुसार, देवबंद या जिला विकास प्राधिकरण से नहीं ली गई किसी भी निर्माण कार्य की परमिशन (अनुमति)।
- चंदा गैंग के सरगने को ईदगाह वक़्फ़ संपत्ति को खुर्द-बुर्द करने का अधिकार किसने दिया है? आगामी 6 वर्षों के लिए ईदगाह की फसल क्रय करने का अधिकार कौन सा कानून देता है?
- सख्त कानूनी व्यवस्था के होते हुए भी यदि कोई भी, किसी भी वक़्फ़ संपत्ति के ताले तोड़कर अपना कब्ज़ा जमा सकता है, तो सभी तथाकथित मुतवल्लियों और कमेटियों का क्या मतलब रह जाता है?
देवबंद। इस कड़वे विश्लेषण की शुरुआत में ही हम यह पूरी तरह साफ और स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि देवबंद की ऐतिहासिक और मुकद्दस ईदगाह का सौंदर्यीकरण हो, वहां आधुनिक सुविधाएं बनें, यह हर सच्चे और संवेदनशील नागरिक की दिली ख्वाहिश है। लेकिन यहां सबसे बड़ा और यक्ष प्रश्न यह खड़ा होता है कि क्या इस नेक, पाकीज़ा और मजहबी काम के लिए अब देवबंद में सिर्फ कुछ गुंडे-मवाली और स्वयंभू ठेकेदार ही बचे हैं? क्या इस ऐतिहासिक नगर में अब इज़्ज़तदार, बा-हैसियत और बा-सलाहियत (योग्य) हस्तियों का अकाल पड़ गया है?
इन दिनों चर्चा में है ईदगाह देवबंद
आज देवबंद की आवाम को खुली आंखों से देखना होगा कि तथाकथित 'ईदगाह कमेटी' और सोशल मीडिया के 'ठग ऑफ देवबंद' के बीच जो 'नूरा कुश्ती' (दिखावे की लड़ाई) चल रही है, उसका असली सच क्या है। साल 2021 के आखिर में जिस चंदा गैंग का उदय ईदगाह के बराबर वाली सड़क से महज़ एक रुपये की गुल्लक रखकर हुआ था, वह 2026 में आपकी आस्था के सबसे बड़े केंद्र—देवबंद ईदगाह—पर काबिज़ हो चुका है। बड़ा सवाल यह है कि क्या देवबंद नगर वासियों के पास 'कॉमन सेंस' की भारी किल्लत हो गई है? महज़ चंद दिनों में 20 लाख रुपये से अधिक की चंदा वसूली की बात खुद यह 'ठग ऑफ देवबंद' सरेआम कबूल कर रहा है। खुफिया विभाग और गृह मंत्रालय को इस बात की गहन जांच करनी चाहिए कि चंद दिनों में इतनी मोटी रकम वसूलने वाला यह गिरोह, इस पैसे का इस्तेमाल देवबंद की अमन और शांति व्यवस्था को भंग करने में तो नहीं करेगा?
आइए, इस चंदा गैंग के पिछले 'ट्रैक रिकॉर्ड' पर एक नज़र डालते हैं कि इन्होंने आज तक जनता के पैसों से शहर का कितना भला किया और अपनी निजी तिजोरियां कितनी भरीं सबसे पहले उस रोड को याद कीजिए, जिसके नाम पर चंदा गुल्लक लगाई गई थी, और बाद में एक चेयरमैन प्रत्याशी ने श्रमदान के नाम पर पूरा खेल रफा-दफा कर दिया। कदीम मस्जिद के चौक से इस गैंग ने देवबंद को 'क्लीन और ग्रीन' बनाने का ढिंढोरा पीटा था। नतीजा? आज देवबंद का AQI (वायु गुणवत्ता सूचकांक) 200 के पार पहुंच चुका है, जनता धूल फांक रही है।
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बडजियाउलहक पर जब चंदा गुल्लक की सदाएं बुलंद हुईं, तो इस गैंग के सरगना ने एक अन्य चेयरमैन प्रत्याशी से 'लिखित आश्वासन' (डील) लिया और गुल्लक उठाकर पठानपुरा में विराजमान हो गए। तहसील चौक पर भी गुल्लक का मंच सजा। लेकिन सवाल पूछिए—क्या देवबंद आज तक गड्ढा मुक्त हो पाया? क्या शहर के ड्रेनेज चैनल दुरुस्त हुए? क्या मदनी मस्जिद का नाम महल' हो गया? क्या वादे के मुताबिक हार्ट हॉस्पिटल बनकर तैयार हुआ? जब जनता से वसूले गए लाखों रुपये के चंदे से पिछला एक भी काम पूरा नहीं हुआ, तो इस बात की क्या गारंटी है कि आपके खून-पसीने की कमाई से देवबंद ईदगाह का सौंदर्यीकरण हो पाएगा?
सवाल नंबर 2: बिना अनुमति 12 बीघे का प्रोजेक्ट, क्या बुलडोजर को न्योता है? देवबंद की जनता को इतनी कानूनी समझ तो होनी ही चाहिए कि यदि आप खुद अपने वजूद के लिए 50 गज का मकान भी बनाते हैं, तो बिना विकास प्राधिकरण (Development Authority) की अनुमति के एक ईंट नहीं रख सकते। प्रशासनिक सूत्रों से मिली पुख्ता जानकारी देवबंद या जिला विकास प्राधिकरण से ईदगाह में चल रहे किसी भी निर्माण कार्य की कोई परमिशन (नक्शा पास) नहीं ली गई है। बिना किसी ले-आउट के, बिना जल निकासी (ड्रेनेज) के नक्शे के और बिना किसी तकनीकी विशेषज्ञ की जांच के, 12 बीघे के इस विशाल और संवेदनशील प्रोजेक्ट को सिर्फ 'ठग ऑफ देवबंद' की हठधर्मी और मनमानी के भरोसे छोड़ दिया गया है। डर इस बात का है कि बिना कानूनी प्रक्रिया के किया जा रहा यह अवैध निर्माण, कहीं आने वाले दिनों में सरकारी बुलडोजरों के लिए रास्ता न खोल दे! अगर ऐसा हुआ, तो कौम के इस भारी नुकसान का जिम्मेदार कौन होगा?
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सवाल नंबर 3: वक़्फ़ संपत्ति को खुर्द-बुर्द करने का अधिकार किसने दिया? कानून को ताक पर रखकर इस चंदा गैंग के सरगना को ईदगाह की वक़्फ़ संपत्ति को खुर्द-बुर्द करने का अधिकार आखिर किसने दे दिया? देश का कौन सा कानून किसी गैर-कानूनी व्यक्ति या गिरोह को आगामी 6 वर्षों के लिए ईदगाह की फसल को क्रय (खरीदने-बेचने) करने का अधिकार देता है? देश में इतनी सख्त कानूनी व्यवस्था, वक़्फ़ बोर्ड और प्रशासनिक नियम होने के बावजूद, अगर कोई भी ऐरा-गैरा आकर किसी वक़्फ़ संपत्ति के ताले तोड़कर अपना कब्ज़ा जमा लेगा, तो फिर इन तथाकथित मुतवल्लियों, कमेटियों और वक़्फ़ कानूनों का मतलब ही क्या रह जाता है? एक आत्मचिंतन हम विकसित भारत में कहां खड़े हैं?
मेरा देवबंद की अवाम और दानदाताओं से सीधा सवाल है यदि कोई दबंग या अपराधी आपके निजी मकान के ताले तोड़कर उस पर कब्ज़ा कर ले, और आप सिर्फ इसलिए खामोश रहें क्योंकि सामने वाले का जेल आना-जाना लगा रहता है, तो क्या इस खामोशी को बुजदिली और मूर्खता का सबसे बड़ा अवॉर्ड नहीं मिलना चाहिए? आज बात ईदगाह कमेटी की है। कल को कोई दूसरा बदमाश उठकर कहेगा कि—"नगर पालिका सही काम नहीं कर रही थी, इसलिए मैंने अपना निजी विकास कार्यालय खोल लिया है, मुझे चंदा दो। परसों कोई और गुंडा खड़ा होकर कहेगा कि—"देवबंद थाना सही काम नहीं कर रहा, इसलिए मैंने अपना निजी थाना खोल लिया है। अगर हम कानून के समानांतर ऐसी अराजक व्यवस्थाओं को चंदा देकर पालते रहे, तो हम 'विकसित भारत' की दौड़ में कहां जाकर खड़े होंगे? इस पर गंभीरता से विचार कीजिए।





