चमचमाती रील्स बनाम घुटनों तक पानी 50 करोड़ के सालाना बजट वाले देवबंद को नगर पालिका ने बनाया 'टापू
- देवबंद में 'चुनावी लॉलीपॉप' पिघला, 'लिफाफाखोरों के विकास की खुली पोल; दारुल उलूम के उस्तादों के घरों के बाहर घुटनों तक गंदा पानी!
- देवबंद पालिका का 50 करोड़ का बजट जनता के ड्रेनेज में गया या चहेतों की जेब में ये तो पालिका अध्यक्ष या EO साहब ही बता सकते हैं
देवबंद। क्या आपको नगर पालिका अध्यक्ष के करीबी सभासदों की वह 'एक मिनट की रील' याद है? जिसमें ड्रोन उड़ रहे थे, जेसीबी गरज रही थी और दावा किया जा रहा था कि देवबंद के नाले अब एकदम चकाचक साफ हो चुके हैं? अगर याद है, तो ज़रा बाहर निकलिए और देवबंद की सड़कों पर बहती इस 'सरकारी नाकामी की नदी' को देखिए। मानसून की पहली ही मूसलाधार बारिश ने नगर पालिका के उस हाई-टेक प्रोपेगैंडा और कागजी तैयारियों की धज्जियां उड़ा कर रख दी हैं। सरकारी आंकड़े गवाह हैं कि देवबंद नगर पालिका का सालाना बजट 50 करोड़ के आसपास है। आंकड़ा सुनकर सीना चौड़ा हो जाता है, लेकिन हकीकत देखकर सिर शर्म से झुक जाता है। यह 50 करोड़ का बजट देवबंद की नाले-नालियों, पेयजल आपूर्ति, स्वास्थ्य सेवाओं, जल निकासी या प्रकाश व्यवस्था में नहीं, बल्कि सीधे तौर पर नगर पालिका के करीबियों और चहेतों के 'लिफ़ाफ़ों के विकास' में बहाया जा रहा है!
बीती कई योजनाओं से देवबंद की भोली-भाली जनता को चुनाव के वक्त सिर्फ एक ही लॉलीपॉप चूसाया जा रहा है सीवर लाइन बनेगी!" जनता ने भरोसा किया, वोट दिया और जिताया। लेकिन नतीजे? वादे आज भी फाइलों में दफन हैं और जनता गंदे पानी में डूबने को मजबूर है। हैरानी की बात तो यह है कि 'लश्करे-चाटुकारों के पास नगर पालिका परिषद की कमियां दिखाने के लिए कोई वक्त नहीं है। हालत यह है कि जिन वार्डों में सभासद निर्विरोध चुने गए थे, वहाँ भी जल निकासी का ऊपर वाला ही मालिक है। और जो खुद को 'अनुभवी' कहकर दूसरी बार चुनाव जीतकर आए हैं, उनके वार्डों के बदतर हालात पर तो कुछ न कहना ही बेहतर है बिलावजह हमको ही डराने धमकाने लगते हैं। मगर हमारे इन 'लिफाफाखोर जनप्रतिनिधियों' को इससे फर्क क्यों पड़ेगा? उन्हें पता है कि जनता को जाति-धर्म और झूठे वादों के जाल में फंसाकर दोबारा वोट तो ले ही लिया जाएगा।
शिक्षा की नगरी में घुटनों तक पानी, ईदगाह से भायला रोड तक 'जल-कर्फ्यू' यह बदहाली किसी दूर-दराज के पिछड़े इलाके की नहीं, बल्कि देवबंद के सबसे वीआईपी और ऐतिहासिक स्थलों की है इस्लामिया डिग्री कॉलेज का पूरा इलाका इस वक्त टापू बन चुका है। विश्व विख्यात दारूल उलूम देवबंद के प्रतिष्ठित उस्तादों (शिक्षकों) के आवासों के बाहर घुटनों तक गंदा पानी जमा है। देश-दुनिया से आए छात्र और विद्वान इस बदइंतजामी के बीच से गुजरने को मजबूर हैं। ईदगाह रोड और भायला रोड जैसे व्यस्त मार्गों पर पानी का बहाव इस कदर हिचकोले खा रहा है मानो कोई पहाड़ी नदी बह रही हो। दोपहिया वाहन चालक बंद हो चुकी गाड़ियों को धक्का लगाते-लगाते हांफ रहे हैं। नवाज गर्ल्स स्कूल के ठीक सामने मुख्य सड़क का हाल सबसे खौफनाक है। छात्राओं और उनके अभिभावकों को इस संक्रामक गंदे पानी के बीच से निकलना पड़ रहा है, जिससे किसी भी वक्त कोई बड़ा हादसा या महामारी फैल सकती है। यही हाल दारूल उलूम रोड का है और यह पहली बार नहीं हुआ है, यह हर बारिश के बाद और हर साल की कहानी है!
अगर शहर के कुछ चुनिंदा 'साहबों' के वीआईपी क्षेत्रों को छोड़ दिया जाए, तो लगभग पूरे देवबंद का ड्रेनेज सिस्टम पूरी तरह फेल हो चुका है। नालों की समय पर सफाई न होने का नतीजा यह है कि अब यह बदबूदार पानी लोगों के ड्राइंग रूम और दुकानों के अंदर तक घुसकर लाखों का नुकसान कर रहा है। टैक्स वसूलने के और रेडी पटरी वालों से जुर्माना करने के मामले में सबसे आगे रहने वाली देवबंद नगर पालिका परिषद जनता को बुनियादी सुविधाएं देने में पूरी तरह दिवालिया साबित हो चुकी है। देवबंद की जनता अब चुप बैठने वाली नहीं है। वह प्रशासन और कुर्सी पर बैठे नुमाइंदों से सीधे तौर पर पूछ रही है कि आखिर जनता की गाढ़ी कमाई और इस 50 करोड़ के भारी-भरकम बजट को किस गड्ढे में ठिकाने लगाया जा रहा है? इसका जवाब तो देना ही होगा!
रिपोर्ट - दीन रज़ा
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