48 लाख पौधों के लक्ष्य पर डीएम अरविंद कुमार चौहान सख्त जियो टैगिंग से लेकर जवाबदेही तक व्यवस्था
- 'आम बहार आपके द्वार' अभियान पौधे लगाना आसान, लेकिन उन्हें पेड़ बनाना सबसे बड़ी चुनौती। वृक्षारोपण नहीं, वृक्ष संरक्षण का संकल्प लें एक पेड़, एक परिवार, एक जिम्मेदारी
- तस्वीरों से आगे बढ़ना होगा 12 जुलाई को 48 लाख पौधे लगेंगे, मगर उनकी जिम्मेदारी कौन निभाएगा?
सहारनपुर। बरसात की पहली फुहार के साथ ही हर साल एक अभियान पूरे देश में जोर-शोर से शुरू होता है वृक्षारोपण अभियान। सरकारी विभाग, जनप्रतिनिधि, अधिकारी, सामाजिक संगठन, स्कूल-कॉलेज और आम नागरिक सभी पौधे लगाते हैं। सोशल मीडिया पर तस्वीरें छा जाती हैं, अखबारों की सुर्खियां बनती हैं और लाखों पौधे लगाने के दावे किए जाते हैं। इस बार भी 12 जुलाई को जनपद में एक ऐतिहासिक लक्ष्य तय किया गया है। प्रशासन पूरे जिले में 47,89,400 यानी लगभग 48 लाख पौधे लगाने जा रहा है। यह निश्चित रूप से एक बड़ा और सराहनीय प्रयास है। लेकिन एक पत्रकार और जागरूक नागरिक होने के नाते मेरे मन में हर साल की तरह इस बार भी वही सवाल उठ रहा है क्या ये पौधे सिर्फ एक दिन की खबर बनकर रह जाएंगे, या आने वाले वर्षों में सचमुच विशाल पेड़ों का रूप भी लेंगे?
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यही सवाल इस पूरे अभियान की असली परीक्षा है। इस बार प्रशासन पूरी तैयारी में दिखाई दे रहा है जिलाधिकारी अरविंद कुमार चौहान की अध्यक्षता में कलेक्ट्रेट सभागार में हुई समीक्षा बैठक से साफ संकेत मिला कि इस बार अभियान को लेकर प्रशासन काफी गंभीर है। बैठक में स्पष्ट निर्देश दिए गए कि कोई भी विभाग लापरवाही नहीं करेगा। जो अधिकारी बैठक में अनुपस्थित रहे, उन्हें तत्काल कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया गया। यानी संदेश बिल्कुल साफ है वृक्षारोपण केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि प्राथमिकता है।
इस बार अभियान को पारदर्शी बनाने के लिए तकनीक का भी सहारा लिया जा रहा है। हर पौधे की जियो टैगिंग होगी। गड्ढों की फोटो अपलोड करनी होगी। रोपण स्थल की जानकारी पोर्टल पर दर्ज की जाएगी। सेल्फी और वीडियो भी अपलोड किए जाएंगे ताकि अभियान का पूरा रिकॉर्ड उपलब्ध रहे। यह व्यवस्था निश्चित रूप से अच्छी है क्योंकि इससे कागजी आंकड़ों की संभावना कम होगी। इस वर्ष अभियान की थीम रखी गई है आम बहार आपके द्वार डीएम ने स्वयं अधिकारियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को पौधे वितरित किए और अधिक से अधिक लोगों से इस अभियान में भाग लेने की अपील की। यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आम का पेड़ केवल पर्यावरण ही नहीं बल्कि आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से भी बेहद उपयोगी माना जाता है।
बैठक में जिले के विभिन्न स्थानों के लिए विस्तृत कार्ययोजना तैयार की गई। काली नदी के किनारे बड़े स्तर पर पौधारोपण किया जाएगा। कंपनी बाग में हरियाली बढ़ाने की योजना बनाई गई व्यापार मंडल के सहयोग से लगभग 400 से 500 पौधे लगाए जाएंगे। दिल्ली रोड के विद्यालयों में वन विभाग और रेंजर्स की मदद से पौधारोपण होगा। जहां जगह कम होगी, वहां विभागों के बीच समन्वय बनाकर पौधे लगाए जाएंगे। यानी इस बार अभियान केवल सरकारी दफ्तरों तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि आम जनता की भागीदारी भी सुनिश्चित करने की कोशिश की जा रही है।
लेकिन असली सवाल अभी भी वहीं खड़ा है... यहीं से शुरू होती है इस अभियान की सबसे बड़ी चुनौती। हर साल करोड़ों पौधे लगाए जाते हैं। रिकॉर्ड बनते हैं। प्रेस नोट जारी होते हैं। नेताओं और अधिकारियों की तस्वीरें अखबारों के पहले पन्ने पर प्रकाशित होती हैं। लेकिन...अगर आप तीन महीने बाद उसी स्थान पर जाएं तो अक्सर वहां क्या दिखाई देता है? कई पौधे सूख चुके होते हैं। कई मवेशियों का भोजन बन चुके होते हैं। कई जगह केवल खाली गड्ढे दिखाई देते हैं। और कुछ जगह तो यह भी याद नहीं रहता कि यहां कभी पौधा लगाया गया था। यही वह सच्चाई है जिस पर शायद सबसे कम चर्चा होती है।
पौधारोपण नहीं, पौधों का संरक्षण सबसे जरूरी सच यह है कि पौधा लगाना केवल शुरुआत है। उसे पेड़ बनाना ही असली काम है अगर लगाया गया पौधा छह महीने बाद ही सूख जाए तो वह पौधारोपण पर्यावरण संरक्षण नहीं बल्कि केवल एक सरकारी कार्यक्रम बनकर रह जाता है। इसलिए अब समय आ गया है कि लक्ष्य केवल पौधे लगाने का नहीं बल्कि उन्हें जीवित रखने का भी होना चाहिए। क्या होना चाहिए? तीन साल की जवाबदेही तय हो जिस विभाग, स्कूल, ग्राम पंचायत या संस्था को पौधे दिए जाएं, उनकी जिम्मेदारी कम से कम तीन वर्षों तक तय होनी चाहिए। केवल पौधा लगाने की नहीं बल्कि उसे जीवित रखने की रिपोर्ट भी अनिवार्य हो।
बिना ट्री-गार्ड के लगाया गया पौधा अक्सर पशुओं का शिकार हो जाता है। इसलिए पौधे के साथ सुरक्षा व्यवस्था भी जरूरी है बरसात खत्म होने के बाद सबसे ज्यादा पौधे पानी के अभाव में सूख जाते हैं। यदि नियमित सिंचाई सुनिश्चित हो जाए तो हजारों पौधों को बचाया जा सकता है। यदि हर जनप्रतिनिधि, हर जागरूक नागरिक, सामाजिक संगठन, शिक्षण संस्थान, आदि आदि, केवल एक पौधे को गोद लेकर उसकी देखभाल का संकल्प ले ले तो किसी सरकारी योजना से ज्यादा बड़ा परिवर्तन दिखाई दे सकता है।एक पेड़...एक परिवार...एक जिम्मेदारी...यही असली हरित क्रांति होगी।
आज जरूरत इस बात की है कि हम पौधे लगाने के बाद उन्हें भूल न जाएं। सेल्फी लेना गलत नहीं है। फोटो खिंचवाना भी गलत नहीं है। गलत तब होता है जब फोटो के बाद पौधा अपनी किस्मत पर छोड़ दिया जाता है। यदि हर लगाया गया पौधा पांच साल बाद भी जीवित मिले, तभी इस अभियान की वास्तविक सफलता मानी जाएगी। बैठक में मुख्य विकास अधिकारी सुमित राजेश महाजन, प्रभागीय निदेशक (सामाजिक वानिकी) चांदनी सिंह, डीएफओ विपुल सिंघल सहित कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे और सभी ने अभियान को सफल बनाने का भरोसा दिलाया।अब जिम्मेदारी केवल प्रशासन की नहीं बल्कि हमारी भी है। जब आप 12 जुलाई को पौधा लगाएं तो केवल कैमरे की ओर देखकर मुस्कुराइए मत उस पौधे की ओर देखकर यह वादा भी कीजिए मैं तुम्हें केवल लगाऊंगा नहीं, बल्कि तुम्हें एक दिन विशाल वृक्ष बनते हुए भी देखूंगा। क्योंकि...पौधारोपण एक दिन का कार्यक्रम हो सकता है, लेकिन पौधों का संरक्षण आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का संकल्प है पर्यावरण बचेगा तो जीवन बचेगा, और जीवन बचेगा तो आने वाली पीढ़ियां हमें धन्यवाद देंगी।




