देहरादून में जब देवबंद के दिग्गजों से मिले अश्वनी मुद्गल एक मुलाक़ात, जिसने पुरानी यादें और इच्छाओं के फलसफे सुलझा दिए!

देहरादून में जब देवबंद के दिग्गजों से मिले अश्वनी मुद्गल एक मुलाक़ात, जिसने पुरानी यादें और इच्छाओं के फलसफे सुलझा दिए!

  • देवबंद से देहरादून पहुँचे वरिष्ठ पत्रकारों और कांग्रेस नेता ने अश्वनी मुद्गल से की खास मुलाकात बचपन की वाकपटुता से लेकर आज की बुलंदी तक का सफर
  • खजूर के पेड़ की तरह ऊंची होती जा रही हैं इच्छाएं! बुलंदियों को छूकर भी सुकून की तलाश में देवबंद के अश्वनी मुद्गल

देहरादून/देवबंद। जिंदगी में जब इंसान कामयाबी की बुलंदियों को छू लेता है, तो अक्सर वो अपने बचपन की गलियों और उन लोगों को याद करता है जिन्होंने उसे चलना सिखाया। कुछ ऐसा ही नजारा उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में देखने को मिला, जब देवबंद से पहुँचे वरिष्ठ पत्रकारों और राजनीतिक हस्तियों के एक खास प्रतिनिधिमंडल ने देवबंद के मूल निवासी और आज देहरादून में एक बड़े मुकाम पर काबिज अश्वनी मुद्गल से मुलाकात की। इस बेहद आत्मीय, भावुक और विस्तृत चर्चा वाली मुलाकात में देवबंद के वरिष्ठ पत्रकार शाहनवाज सलमानी जुल्फिकार बैग दीन रज़ा और सहारनपुर कांग्रेस की जिला उपाध्यक्ष व मशहूर समाजसेवी डॉ. शाजिया नाज़ शामिल रहीं।

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चर्चा के दौरान जब यादों का कारवां पीछे मुड़ा, तो अश्वनी मुद्गल का वो पुराना चेहरा सामने आ गया जिसे देवबंद की अवाम बखूबी जानती है। अश्वनी मुद्गल शुरू से ही, यानी देवबंद में रहते हुए अपनी किशोर अवस्था (बचपन) से ही बेहद वाकपटु (हाजिरजवाब), जिज्ञासु और मिलनसार प्रवृत्ति के धनी थे। उनकी यही खूबी थी कि उन्होंने बचपन में ही देवबंद के बड़े-बड़े काबिल और तजुर्बेकार लोगों से अपने संपर्क बढ़ाए। उन्होंने बड़ों की महफ़िल में बैठकर जिंदगी के वो सबक सीखे, जो किताबों में नहीं मिलते। दूसरों से सीखने की इसी तड़प और हुनर को हासिल करने की जिद ने उन्हें आज सबको पीछे छोड़ते हुए कामयाबी की इस अज़ीम बुलंदी पर पहुँचा दिया है।

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अक्सर देखा जाता है कि लोग कामयाबी पाकर अपनी जड़ें भूल जाते हैं, लेकिन अश्वनी मुद्गल के साथ ऐसा बिल्कुल नहीं है। देवबंद से देहरादून पहुँचे मेहमानों का जिस गर्मजोशी, आदर और सत्कार के साथ उन्होंने स्वागत किया, उसने साबित कर दिया कि आज भी उनके भीतर देवबंद की वही पुरानी तहज़ीब और बड़ों को सम्मान देने के संस्कार जिंदा हैं। कामयाबी के शिखर पर बैठकर भी उनका जमीन से जुड़े रहना इस मुलाकात का सबसे खूबसूरत पहलू रहा। लेकिन, इस लंबी और विस्तृत चर्चा के दौरान जिंदगी का एक ऐसा कड़वा सच भी सामने आया जो आज के हर कामयाब इंसान की कहानी है। अश्वनी मुद्गल जी ने अपने दिल की बात साझा करते हुए माना कि आज जीवन में तमाम सुख-सुविधाएं, नाम और शोहरत पाकर भी वो आत्मिक शांति (सुकून) कहीं ओझल है।

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इंसानी फितरत भी अजीब है। जब हम बुलंदियों पर पहुँचते हैं, तो हमारी इच्छाएं किसी 'खजूर के पेड़' की तरह और ऊंची और प्रबल होती चली जाती हैं। खजूर का पेड़ जितना ऊंचा होता है, उसकी छांव उतनी ही दूर चली जाती है। ठीक इसी तरह, इंसान सब कुछ पाकर भी और पाने की चाह में भीतर की शांति कहीं खो देता है देवबंद के पत्रकारों और डॉ. शाजिया नाज़ की अश्वनी मुद्गल के साथ हुई यह मुलाकात सिर्फ एक शिष्टाचार भेंट नहीं थी, बल्कि यह कामयाबी, बचपन के संघर्षों और जिंदगी के असली मक़सद पर की गई एक बेहद गंभीर और दार्शनिक समीक्षा थी। यह मुलाकात हमें सिखाती है कि हम चाहे कितनी भी ऊंची उड़ान भर लें, हमारे दिल का एक कोना हमेशा अपनी मिट्टी और अपने पुराने दोस्तों के लिए धड़कता रहना चाहिए।

रिपोर्ट - दीन रज़ा







Deen Raza

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