स्वेच्छा, कानूनी हक, सियासी दबाव और बदलते समाज की तस्वीर
- आयुष उर्फ़ मोहम्मद अली, शहज़ाद उर्फ़ शंकर... समाज पर क्या असर पड़ रहा है?
- क्या हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे की साझी विरासत को सियासत की नज़र लग रही है?
पश्चिमी उत्तर प्रदेश, खास तौर पर सहारनपुर मंडल, पिछले कुछ वक्त से धर्म परिवर्तन के मामलों को लेकर चर्चा में है। हाल के दिनों में जिस मामले ने सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोरीं, वह शामली के आयुष मलिक उर्फ़ मोहम्मद अली का मामला रहा। इस मामले की चर्चा अभी ठंडी भी नहीं पड़ी थी कि सहारनपुर के शहज़ाद उर्फ़ शंकर का मामला सामने आ गया। इसके बाद सोशल मीडिया पर बहस का एक नया दौर शुरू हो गया और लोग अपने-अपने नजरिए से बातें करने लगे। आयुष मलिक मामले में एक तरफ परिवार ने जबरन धर्म परिवर्तन और साज़िश के आरोप लगाए, तो दूसरी तरफ खुद आयुष ने कहा कि उन्होंने अपनी मर्जी से इस्लाम कबूल किया है। मामला पुलिस तक पहुंचा और जांच शुरू हो गई। इसी वजह से यह मामला सिर्फ एक परिवार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे समाज में चर्चा का विषय बन गया।
वहीं, सहारनपुर के शहज़ाद के सनातन धर्म अपनाने और शंकर नाम रखने की खबर ने भी लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा। इस मामले को लेकर भी सोशल मीडिया पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कुछ लोगों ने इसे व्यक्ति की निजी आज़ादी बताया, जबकि कुछ ने इसे समाज में आ रहे बदलाव के तौर पर देखा। लेकिन इन सबके बीच कुछ ऐसे सवाल हैं, जिन पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है। क्या धर्म परिवर्तन सिर्फ किसी व्यक्ति की आस्था और निजी फैसला है, या फिर अब यह सामाजिक और सियासी बहस का हिस्सा बन चुका है? क्या एक बालिग इंसान को अपनी पसंद का धर्म चुनने का पूरा हक नहीं है? या फिर ऐसे मामलों में परिवार, समाज और सियासत का दबाव भी असर डालता है?
हमारे संविधान ने हर नागरिक को अपनी पसंद का धर्म मानने और अपनाने की आज़ादी दी है। साथ ही, जबरन या धोखे से धर्म परिवर्तन को रोकने के लिए कानून भी बनाए गए हैं। ऐसे में किसी भी मामले की सच्चाई सामने लाने की जिम्मेदारी जांच एजेंसियों और अदालतों की होती है, न कि सोशल मीडिया की। सबसे बड़ा सवाल उन हिन्दू-मुस्लिम भाईचारा समितियों और सामाजिक संगठनों पर भी उठता है, जो समाज में अमन और एकता की बातें करते हैं। अक्सर देखा जाता है कि जब इस तरह के मामले सामने आते हैं, तो कई संगठन समाज को जोड़ने की बजाय अपने-अपने पक्ष का समर्थन करते ज्यादा दिखाई देते हैं। ऐसे वक्त में जरूरत इस बात की होती है कि सभी समुदायों के जिम्मेदार लोग एक मंच पर आकर अमन, भाईचारे और आपसी भरोसे का पैगाम दें।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की पहचान हमेशा गंगा-जमुनी तहजीब, साझा संस्कृति और आपसी मोहब्बत के लिए रही है। यहां बरसों से हिन्दू और मुस्लिम समुदाय एक-दूसरे के त्योहारों में शामिल होते रहे हैं और हर सुख-दुख में साथ खड़े रहे हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में सोशल मीडिया और बढ़ते सियासी ध्रुवीकरण ने इस माहौल को प्रभावित किया है। ज़रूरत इस बात की है कि धर्म परिवर्तन जैसे संवेदनशील मामलों को सनसनी या नफरत की नजर से देखने के बजाय समझदारी और संवेदनशीलता के साथ देखा जाए। क्योंकि किसी एक घटना के आधार पर पूरे समाज या किसी एक समुदाय के बारे में राय बना लेना न सिर्फ गलत है, बल्कि इससे समाज में दूरियां भी बढ़ सकती हैं। आखिरकार, किसी भी समाज की ताकत उसकी विविधता, आपसी भरोसे, सहनशीलता और भाईचारे में ही होती है। इसलिए जरूरी है कि हम मतभेदों के बावजूद संवाद और सौहार्द का रास्ता अपनाएं।

