लफ़्ज़ों का जादूगर अब ख़ामोश है डॉ. बशीर बद्र के निधन पर देवबंद से उठी शोक की आवाज़

लफ़्ज़ों का जादूगर अब ख़ामोश है डॉ. बशीर बद्र के निधन पर देवबंद से उठी शोक की आवाज़

  • डॉ. बशीर बद्र का जाना उर्दू अदब के एक सुनहरे युग का अंत है।  डॉ. नवाज देवबंदी

देवबंद। उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाए..। ​उर्दू शायरी की दुनिया का वो चमकता हुआ सितारा, जिसने अपनी आसान मगर बेहद गहरी शायरी से करोड़ों दिलों पर हुकूमत की, आज हमेशा के लिए खामोश हो गया। मशहूर शायर, बेमिसाल ग़ज़लकार और पद्मश्री से सम्मानित डॉ. बशीर बद्र का 91 वर्ष की उम्र में भोपाल में निधन हो गया। ​जैसे ही उनके इंतकाल की खबर आई, न सिर्फ भोपाल, बल्कि उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक कस्बे देवबंद सहित पूरे देश और दुनिया के साहित्य प्रेमियों में शोक की लहर दौड़ गई। ऐसा लग रहा है मानो उर्दू अदब (साहित्य) का एक बहुत खूबसूरत पन्ना हमेशा के लिए पलट गया है।

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​डॉ. बशीर बद्र का जाना किसी एक शहर का नुकसान नहीं है, बल्कि यह पूरी कौम और ज़ुबान का नुकसान है। देवबंद के सुप्रसिद्ध अंतर्राष्ट्रीय शायर और साहित्यकार डॉ. नवाज देवबंदी ने इस दुखद घड़ी में गहरा शोक व्यक्त करते हुए कहा कि डॉ. बशीर बद्र का जाना उर्दू अदब के लिए एक ऐसा नुकसान है जिसकी भरपाई मुमकिन नहीं है। उनकी शायरी ने नई पीढ़ी को उर्दू से जोड़ने का काम किया। वे सिर्फ एक शायर नहीं थे, बल्कि एक सोच, एक तहज़ीब और एहसास का नाम थे। उनकी ग़ज़लें हमेशा लोगों के दिलों में जिंदा रहेंगी।

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​डॉ. नवाज देवबंदी ने आगे कहा कि बशीर बद्र साहब ने अपनी रचनाओं के ज़रिए इंसानियत, मोहब्बत और रिश्तों की अहमियत को जिस बेहद सादगी भरे अंदाज़ में पेश किया, वही खूबी उन्हें दुनिया के बाकी शायरों से अलग और बहुत ऊंचा मुकाम देती है ​आमतौर पर माना जाता है कि उर्दू शायरी भारी-भरकम शब्दों के बिना अधूरी है, लेकिन डॉ. बशीर बद्र ने इस धारणा को पूरी तरह बदल दिया। उन्होंने आम बोलचाल की भाषा को शायरी का हिस्सा बनाया उनके शेर इतने सीधे और सच्चे होते थे कि एक बार सुनने पर ही ज़हन में उतर जाते थे उन्होंने मोहब्बत, जुदाई, वक्त के थपेड़ों और आम इंसान के संघर्ष को अपनी ग़ज़लों का विषय बनाया एक दौर था जब देश-विदेश के मुशायरे बशीर बद्र के नाम के बिना अधूरे माने जाते थे। उनका तरन्नुम लोगों को मंत्रमुग्ध कर देता था।

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डॉ. बशीर बद्र का जन्म उत्तर प्रदेश में हुआ था उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) से अपनी पढ़ाई पूरी की और बाद में मेरठ कॉलेज में लंबे समय तक उर्दू के प्रोफेसर रहे उर्दू साहित्य में उनके अद्वितीय योगदान के लिए उन्हें भारत सरकार द्वारा 'पद्मश्री' से नवाजा गया था। इसके अलावा उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित देश-विदेश के दर्जनों प्रतिष्ठित सम्मान मिले उनकी किताबों और ग़ज़लों ने उर्दू साहित्य को नई ऊंचाइयों पर पहुँचाया ​बशीर साहब आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी विरासत उनके इन कालजयी शेरों के रूप में हमेशा हमारे साथ रहेगी

कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से

ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो।

​"लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,

तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में।

​"दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे,

जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों।

​देवबंद सहित पूरे सहारनपुर जनपद के साहित्य प्रेमियों, कवियों और बुद्धिजीवियों ने उनके निधन पर गहरा दुख जताया है। सोशल मीडिया से लेकर अदबी महफिलों तक, हर तरफ सिर्फ बशीर साहब की यादें और उनकी शायरी गूंज रही है ​बशीर बद्र साहब का जाना वाकई उर्दू साहित्य की एक ऐसी अपूरणीय क्षति है, जिसे कभी पूरा नहीं किया जा सकेगा। वह जिस्मानी तौर पर भले ही दुनिया से रुख्सत हो गए हों, लेकिन अपनी ग़ज़लों के ज़रिए वह हर आशिक-ए-उर्दू के दिल में हमेशा धड़कते रहेंगे ​अल्लाह उन्हें जन्नत में आला मुकाम अता फरमाए। आमीन।

रिपोर्ट - दीन रज़ा

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