देवबंद में बिजली चोरी रोकने का अभियान या विभागीय ढोंग? पहले लाइनमैनों ने हटवाई कटिया, फिर पीएसी के साथ चेकिंग कर बनाई सफलता की कहानी!

देवबंद में बिजली चोरी रोकने का अभियान या विभागीय ढोंग? पहले लाइनमैनों ने हटवाई कटिया, फिर पीएसी के साथ चेकिंग कर बनाई सफलता की कहानी!

  • बड़े बकायेदारों पर मेहरबानी, आम उपभोक्ताओं पर कार्रवाई! 8.5 लाख के बकाये पर हाईवोल्टेज ड्रामा क्यों?
  • कटिया किसके इशारे पर लगती और हटती है? देवबंद में बिजली चोरी पर विभागीय मिलीभगत की चर्चाओं ने पकड़ा जोर

देवबंद। बिजली चोरी रोकने के नाम पर सोमवार को पीएसी बल के साथ चलाए गए चेकिंग अभियान के बाद विभाग की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। विभाग के प्रेस नोट और स्थानीय लोगों से मिल रही जानकारियों के बीच कई ऐसे विरोधाभास सामने आए हैं, जिनसे पूरे अभियान की पारदर्शिता और मंशा पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। 

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देवबंद नगर के अलग-अलग क्षेत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, सुबह से ही विभाग के लाइनमैन कथित रूप से कटिया तार और बाईपास हटाने में जुट गए थे। स्थानीय लोगों का कहना है कि टीम के पहुंचने से पहले ही कई स्थानों से अवैध कनेक्शन हटवा दिए गए। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब कार्रवाई से पहले ही सबूत हटवा दिए गए, तो फिर पीएसी बल के साथ चले इस चेकिंग अभियान का वास्तविक उद्देश्य क्या था?

विभाग के अनुसार कुल 171 परिसरों की जांच की गई, लेकिन इसके बावजूद केवल 20 लोगों के कनेक्शन काटे गए। आखिर बाकी 151 परिसरों में क्या स्थिति मिली, इसका स्पष्ट विवरण न तो विभाग के प्रेस नोट में दिया गया और न ही हमारे संवाददाता द्वारा फोन पर जानकारी लेने के बावजूद अधिकारी संतोषजनक जवाब दे सके। जानकारी के अनुसार दो उपभोक्ताओं के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज कराई गई है। विभाग ने यह भी बताया कि संबंधित क्षेत्र में करीब 8.5 लाख रुपये का बिजली बिल बकाया था, जिसमें से अभियान के दौरान कुछ बकाया राशि की वसूली भी की गई।

लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि देवबंद का पठानपुरा मोहल्ला नगर का सबसे बड़ा और घनी आबादी वाला क्षेत्र माना जाता है। यदि पूरे क्षेत्र में विभाग का कुल बकाया केवल 8.5 लाख रुपये है, तो क्या इतने बड़े स्तर पर पीएसी के साथ अभियान चलाना वास्तव में आवश्यक था? या फिर यह केवल उच्च अधिकारियों को प्रभावित करने और आंकड़ों की खानापूर्ति का प्रयास था? नगर में यह चर्चा भी तेज है कि विभाग का पूरा ध्यान छोटे उपभोक्ताओं पर रहता है, जबकि जिन बड़े व्यापारिक प्रतिष्ठानों, उद्योगों और कारखानों पर लाखों रुपये का बकाया है, उन पर विभाग की कार्रवाई उतनी प्रभावी क्यों नहीं दिखाई देती? सवाल उठ रहे हैं कि आखिर बड़े बकायेदारों की सूची बनाकर उन पर सख्त कार्रवाई क्यों नहीं की जाती?

इतना ही नहीं, विभाग अब तक यह भी ठोस रूप से साबित नहीं कर पाया है कि बिजली की सबसे अधिक चोरी आम उपभोक्ता कर रहा है या फिर बड़े उद्योग, वीआईपी प्रतिष्ठान और कारखाना मालिक। यदि चोरी का बड़ा हिस्सा औद्योगिक या व्यावसायिक उपभोक्ताओं से जुड़ा है, तो कार्रवाई का केंद्र केवल आम नागरिक ही क्यों बनते हैं? स्थानीय लोगों के बीच एक और चर्चा जोरों पर है। लोगों का दावा है कि कुछ उपभोक्ता, जिनके घरों में एयर कंडीशनर (एसी) चल रहे हैं, वे कथित रूप से लाइनमैनों से सांठगांठ कर कटिया या बाईपास के जरिए बिजली का उपयोग करते हैं और जहां हजारों रुपये का बिल आना चाहिए, वहां कथित रूप से मामूली रकम देकर अनियमित तरीके से बिजली का उपभोग किया जाता है। ऐसी चर्चाओं ने विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।

अब जनता पूछ रही है कि यदि विभाग वास्तव में बिजली चोरी रोकना चाहता है तो सूचना लीक होने, लाइनमैनों की भूमिका, बड़े बकायेदारों पर कार्रवाई और कथित मिलीभगत जैसे मुद्दों की निष्पक्ष जांच क्यों नहीं कराई जाती? आखिर कब तक छोटे उपभोक्ताओं पर कार्रवाई दिखाकर बड़े खिलाड़ियों को बचाने के आरोप लगते रहेंगे?

रिपोर्ट - दीन रज़ा







Deen Raza

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